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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

भूखा सो गया

अमित दुबे

कोरोना संक्रमण काल में मजदूर मजबूरी के हाल में गृह बंदी में हुई बदहाली बर्तन हो गये खाली खाली मजदूरी करके खाने वाली रो रही है गंगिया ताई आज भूखा सो गया भीखु भाई...... वोट बैंक के अंक गणित में मजहबी विश्वास की उम्मीद में हम दो हमारे दो भूखे खड़े हैं कुछ तो मस्ती में पड़े हैं और खा रहे राशन मलाई रो रही है गंगिया ताई आज भूखा सो गया भीखु भाई......


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