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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

बस कुछ दिनों की बात है

कुलदीप कबीरवंशी

द्वार पे खड़ा, संकट है बड़ा, थोड़े मुश्किल हालात है, ये हालात भी सुधर जायेंगे, बस कुछ दिनों की बात है। माना विवश है आज मनुष्यता, सम्मुख शक्तिहीन समय है ये, कभी पूर्णिमा, कभी अमावस, इस प्रकृति का नियम है ये, रजनी के बाद भोर है निश्चित तो क्या हुआ अभी काली रात है, बस कुछ दिनों की बात है बस कुछ दिनों की बात है।। जीवन के बाग़ में, देह के वृक्ष पे, आत्मचिंतन के फूल खिलने का, ये अकेलापन क़ैद नहीं है यारों, ये अवसर है खुद से मिलने का, लाभ उठाकर भीतर से करलें बाहर से फिर होनी मुलाक़ात है, बस कुछ दिनों की बात है बस कुछ दिनों की बात है।। कभी ख़्वाब था सिपाही जैसा, अब राह मिली है, दौड़ो-भागो, हम सब के भीतर एक है सैनिक उसने अंगड़ाई ली है, तुम भी जागो, हमारी स्थिर-एकता पर निर्भर करोड़ो लोगो के जज़्बात है, बस कुछ दिनों की बात है बस कुछ दिनों की बात है।। इस विचित्र घनघोर युद्ध में, योद्धात्मा बुद्ध के शस्त्र चुनने का, इस आपदा पर विजयी होकर अवसर है विश्वगुरु बनने का, अजेय शत्रु के मुखर आघात पे ये हमारा मौन प्रतिघात है। बस कुछ दिनों की बात है बस कुछ दिनों की बात है।।

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