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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

बहुत याद आते हैं

डॉ० डी एम मिश्र

बहुत याद आते हैं गुज़रे हुए दिन हवा हो गये वो महकते हुए दिन मेरी याद आये तो यह सोच लेना इधर भी वही हैं तड़पते हुए दिन उठाओ नज़र तो शिकारी ही दिखते परिंदों के जैसे हैं सहमे हुए दिन ज़रा मेरे हालात पर गौर करना बचे हैं विवशता के मारे हुए दिन सितारों से कैसे मुलाकात होगी नज़रबंद घर में हैं उड़ते हुए दिन ये मुमकिन नहीं बंद सब रास्ते हों चलो याद करते हैं भूले हुए दिन

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