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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 85, मई(द्वितीय), 2020

मां.....

सुशील यादव

अलंघ्य कब लगा मुझे,कोई बड़ा पहाड़। मां तेरी आवाज थी ,मेरी कंठ दहाड़।। मुझमें साहस जो भरा,जोश भरा अकूत। तेरी ममता मोल क्या, देवी नभ की दूत।। किया क्षमा हर भूल को,हर गलती को माफ़। तेरे निर्मल हृदय जल,छवि दिखती थी साफ़ ।। केवल क्षमता से भरी ,नहीं अकेली आप। मां बिछुड़ा मेरी तरह,जानेगा संताप।। अब तो विषम विकल घड़ी,काया आती याद। मां गांधारी से बनी ,दिव्य दृष्टि फ़ौलाद ।। हर जननी को सुत कहे, मिले दुबारा कोख । दर्द निवारक मां रही,जैसे स्याही सोख ।।

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