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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 61, मई(द्वितीय), 2019

नेताजी का भाषण

धर्मेन्द्र कुमार

नेताजी खादी धारण किये‚गाँधीवादी टोपी सम्भाले‚माईक पकड़े मंच से बोल रहे थे—“बन्धुओं मैं सत्ता में आते ही जात—पाँत और धर्म का आडम्बर ख़त्म कर दूँगा। इससे बहुतों की मानहानि हुई है‚मान—सम्मान और गरिमा का अनादर हुआ है‚प्रतिभायें कुंठित हुई है‚आपसी शत्रुता और वैमनस्य को बढ़ाया है‚सदा ख़ून की नदियाँ बहायी है। मैंने प्रण लिया है कि राष्ट्रको जाति—धर्म मुक्त बनाऊँगा। मैं अक्सर ग़रीबों के यहाँ रात गुजारता हूँ।दलितों‚शुद्रों के यहाँ खाना खाता हूँ। बहुत नज़दीक से उनकी बेबसी‚लाचारी‚ग़रीबी और सिसक को देखा है। मैं इस कुप्रथा को हमेशा के लिए समाप्त कर दूँगा।”

समाज के एक बड़े समुदाय ने कोसा—“जिसे ईश्वर ने स्वयं बनाया है‚उसे तुम तो क्या‚तुम्हारा बाप भी ख़त्म न कर सकेगा।यह तो सरासर अधर्म है। इस पाखण्डी‚अधर्मी को कौन वोट देगा \”

शिक्षित समुदाय बोला—“धन्य हैं नेताजी ! और धन्य हैं इनके कारनामें ! लगता है अब देश और जनता का कल्याण होकर रहेगा। कितना विशाल हृदय ! बराहमन होकर नीचों के यहाँ खाना खाते हैं। लगता है‚युग परिवर्तन के दिन आ गये। ऐसे सहृदय व्यक्ति को कौन वोट नहीं देगा \”

नेताजी बोलते रहे—“भ्रष्टाचार]घूसखोरी और नशामुक्त भारत का निमार्ण करूँगा। जहाँ सबके लिए समान वेतन और समान सुविधायें होंगी। कोई बड़ा और छोटा न होगा। ड्युटी के बाद कोई वी०आई०पी० न रहेगा। किसी को सरकारी ख़र्चें का अतिक्रमण करने का अधिकार न होगा। अन्य कर्मचारियों की भाँति सांसदों और विधायकों का भी पेंशन बंद कर दिया जाएगा या सभी कर्मचारियों पर लागू कर दिया जाएगा। दोहरा व्यवहार हरगिज़ बर्दास्त न होगा। एक ही व्यक्ति को दो—दो या तीन—तीन जगहों से वेतन लेने का कोई अधिकार नहीं।”

समाज का छोटा भाग—“मारों इस सत्यानाशी को‚बड़ा—छोटा भी समाज से कभी ख़त्म होगा ! अमीर—गरीब सदा से रहे हैं‚और आगे भी रहेंगे। ये शाश्वत चीज़े हैं‚सत्युग में न ख़त्म हुआ‚तो अब क्या होगा। इस न्याय के पुतले को चुनाव में बताऐंगे। कभी जीत न पाएगा !”

समाज का बड़ा तबका—“कितना उच्च और पवित्र विचार हैं। लूट—खसोट ख़त्म होना उतना हीज़रूरी है जितना समाज से आर्थिक विषमता का समाप्त होना। नेताजी की दृष्टि उनके शरीर के विपरीत है। लोकतंत्र की सार्थकता इसी में है।इन्हें जितने से कौन रोकेगा ?”

नेताजी आगे बोले—“कानून की कठोरता और वृहत्ताजिसमें हर जोड़ का तोड़ है तथा संदेहात्मक तथ्यों को समाप्त कर असंदिग्ध और कठोर‚स्पष्ट संविधान का निर्माण करना मेरी मंशा है। किन्तु इसके लिए मेरा बहुमत से आना बहुत ज़रूरी है। बलात्कार‚हिंसा‚देशद्रोह‚छुआछुत‚भेदभाव और सर्वजनिक सम्पत्ति का दुरूपयोग तथा ठगी‚बेईमानी‚घूसखोरी आदि अपराधों के लिए मौत की सज़ा सुनिश्चित करूँगा। अब केस—फौज़दारी वर्षों न चलेगी‚मात्र दो महीने के अंदर सज़ा तय हो जाएगी। तब देखूँगा बुराइयाँ कैसे नहीं समाप्त होती है।”

समाज का छोटा भाग—“ये क्या मज़ाक़ है ! बच्चों का खेल है‚फाँसी पर चढ़ा दोगे ! कौन घूस नहीं लेता \लेकर अकेले खाता नहीं इसका हिस्सा ऊपर तक जाता है। जो जितना ऊँचा हैउतना ही कलुषित और दोषी है। कोई कह दे मैं इस सत्य से अनभिज्ञ हूँ‚तो खड़े—खड़े अपनी मूँछें ऊखड़वा लूँ। इन्हीं महाशय से पुछियें‚जलसों‚मंचों के व्यवस्था‚पार्टियों के संचालन तथा चुनावों के समय ख़र्च करने के लिए इतना पैसा कहाँ से आता है \यह नेता है कि कसाई‚इस विधर्मी को चुनाव में बताऐंगे। न ख़ूद वोट देंगे‚न दूसरों को देने देंगे।”

समाज का बड़ा भाग—“सचमुच ऐसा हो जाए तो धरती स्वर्ग बन जाएगी। कितना नेक दिली और न्यायप्रिय इंसान है। मानों लोकतंत्र घनीभूत होकर बरसने वाला है। आने दो चुनाव‚ हम भी वोट देंगे और दूसरों से भी दिलवायेंगे।” छः महीना बाद।

देश का सबसे बड़ा मैदान जनता से खचाखच भरा हुआ है। नेताजी चुनाव में बहुमत से विजय होने के बाद उसी पोशाक में‚उसी मंच पर अपनी धर्मपत्नी और पच्चीस वर्षीय लड़का तथा इक्कीस वर्षीय कन्या के साथ उपस्थित हुएहै। वे माईक के आगे कह रहे हैं—“सज्जनों ! मुझे अपना वचन याद है। विभिन्न प्रकार के कुरीतियों और बुराइयों को मिटाने‚बेरोज़गारी ख़त्म करने तथा बराबरी और समानता का हक़ दिलाने का दिन आ गया है। इस शुभ उद्देश्य की शुरूआत आज से‚बल्कि अभी से होगा। आपलोगों के सामने आज दस अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाह सम्पन्न होगा। दूल्हा—दुल्हन आ चुके हैं।”पिता के सुकृति से बेटा राहुल और बेटी पुष्पा भक्तिमय और गद्गद् हुए जाते थें। कुछ कहने की इच्छा से कई बार उठे किन्तु संकोचवश बैठ गये।

कुछ ही देर में दस दूल्हा—दुल्हन के जोड़े मंच पर आ गये। माला डाल कर शादी की रस्म पूरा होने ही वाला था। तभी राहुल हिम्मत करते हुए खड़ा होकर बोला—“इस शुभ घड़ी और पिताजी के पुण्य कार्य में मैं भी सहयोग करना चाहता हूँ। यदि गोसाई राम को एतराज़ न हो तो मैं उनकी दुहिता सुशीला से परिणय करना चाहुँगा।”मंच के एक कोने में मालाओं का ढेर लगा था। उसमें से एक माला लेकर सुशीला मंच पर आ गयी।

भाई के साहसपूर्ण कार्य से पुष्पा भी उतेजित हो गयी‚दबी चिंगारी को भाई के मनोबल ने हवा दे दी। भय और कुरीतियों का डर जाता रहा। माईक के पास आकर बोली—“पूज्य पिताजी और आदरणीय भैया जी को मालूम हो कि मैं इस सुकर्म में उनसे पीछे नहीं रहूँगी। मैं पिताजी के कर्मठ कार्यकर्ता अर्जुन डोम के बेटे चन्द्रशेखर डोम से प्रेम करती हूँ‚और इस पावन घड़ी में उनसे शादी कर पिताजी की कीर्ति में चार चाँद लगाना चाहती हूँ।”चन्द्रशेखर माला लेकर मंच पर आ गया।

उसी समय नेताजी की पत्नी माईक के पास आकर बोली—“मुझे अपने पति‚बेटे और बेटी पर गर्व है। मंच पर जितने भी वर—वधू खड़े हैं सभी मेरे संतान हैं। इतना साहस और सुकृति शायद ही किसी ने दिखायी हो। मेरे पतिदेवता के तमाम गुणों से युक्त हो गये हैं। यह शक नहीं कि मैं इनसे अटूट प्रेम करती थी‚किन्तु अब पूजा करूँगी। आज से वे मेरे श्रद्धा और भक्ति के पात्र हो गये हैं। यहाँ उपस्थित सभी वर—वधू को सच्चे हृदय से आशीष देती हूँ और उनके मंगलमय‚सुखद भविष्य की कामना करती हूँ।”

पंडित भानु प्रताप ने बेटे‚बेटी और पत्नी की तरफ़ आग्नेय नेत्रों से देखे‚उनकी आँखों से ज्वाला निकल रही थी। क्रोध से शरीर काँप रहा था‚दाँत आपस में रगड़ खा रहे थे। हवा बहने के बावजूद भी पसीने से तर हो गये थे। चेहरा लाल‚तमतमा गया था। वे चिखने ही वाले थे कि बड़े आवाज़बक्स से अनजानी आवाज़ निकली—“आप घबड़ाइये मत‚मंत्री जी चाहते हैं सारी सरकारी नौकरियाँ ठेके पर कर दी जाए। जिससे व्यय का एक बहुत बड़ा स्रोत बच जाएगा‚जो हमारे चुनावी जलसों और वेतन—भत्तों के काम आएगा। ठेकेदारी के कमीशन से हम माला—मालहो जाएँगे। जात—पाँत के नाम पर दो—चार शादियाँ करा देंगे‚भ्रष्टाचार के नाम पर विपक्षियों का भंडाफोड़ कर फाँसी पर चढ़ा देंगे‚संविधान में फेर—बदल भी होगा‚किन्तु अपने हक़ में। बिजली—सड़क देंगे‚डीजल—पेट्रोल और रसोई गैस भी देंगे किन्तु उसका मनमाना दाम भी लेंगे। सांसदों का वेतन—भत्ता बढ़ाना ज़रूरी है‚उन्हीं पर हमारी सरकार टिकी है।”देखने पर पता चला यह आवाज़ मंच के पीछे से आ रही थी। जहाँ समस्त मंत्रिगण बैठे देश के भविष्य की चिंता कर रहे थें‚नीति और रणनीति बना रहे थें। गलती से उनके बीच वाले टेबल पर रखी माईक खुली रह गयी थी।


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