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वर्ष: 1, अंक 13, मई(द्वितीय), 2017



*युद्ध नही अब रण होगा*
(एक आक्रोश)


सुशील शर्मा

अब इंतजार नही होगा 
अब तो होगा समर महान।
भारत के शीशों के बदले
 पाक बनेगा कब्रिस्तान।

हम से जन्मा हमसे पनपा 
हम को ही आंख दिखाता है।
चोरी से छुपकर घुस कर 
वीरों पर घात लगाता है।

शत्रु शमन के लिए उठी 
ये तलवार खून की प्यासी है।
दम हो जिस में करे सामना 
ये रणचंडी अविनाशी है।

रावलपिंडी से लाहौर 
तक हाहाकार मचा होगा।
जिस का सिर धड़ पर होगा
वो एक न शत्रु बचा होगा।

किसी भिखारी से लड़ने 
में शान हमारी नीची है।
लेकिन अब कुत्ते की गर्दन 
आज जोर से भींची है।

सौ पुस्तों तक याद रखोगे 
कि बाप से लड़ना क्या होता।
पूछने वाला भी न मिलेगा 
भाई तू इतना क्यों रोता।

चीनी ताऊ छुप जाएगा 
जब भारत ललकरेगा।
चिल्लाता पैरों पर गिरकर
 तू दोजख में जायेगा।

कितने परमाणु बम हैं 
देखेंगे तेरी झोली में।
नेस्तनाबूत करेंगे तुझ को 
घुस कर तेरी टोली में।

एक एक सैनिक का हिसाब
मांगेंगे छाती पर चढ़ कर।
चुकता करनी होगी कीमत 
तुझ को पैरों पर पड़ कर।

कुत्ते की तू पूंछ समझना 
तुझे  इतना आसान नही।
तुझ से ज्यादा शैतानी 
तो शायद ये शैतान नही।

हम तो शेरों के सवार हैं 
तुम तो आखिर कुत्ते हो।
कब तक खैर मनाओगे 
तुम बीता भर के जित्ते हो।

सहनशीलता की सीमाएं 
तोड़ चुकी तटबंधों को।
कब तक ढोते रहें हम 
इन कपटी क्रूर संबंधों को।

रावलपिंडी से लेकर 
लाहौर करांची जीतेंगे।
सेना और नवाज़ सभी के 
दिन जेलों में अब बीतेंगे।

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