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वर्ष: 1, अंक 13, मई(द्वितीय), 2017



दिल निशाना हो गया

डॉ० दीप्ति गौर

आपको देखे बिना हमको जमाना हो गया l
छा गई खामोशियां गुमसुम तराना हो गया l

गैर से इम्दाद की उम्मीद कर बैठे हैं हम ,
क्या करें जब कोई अपना ही बेगाना हो गया l

इन निगाहों से कोई शिकवा शिकायत क्या करें,
तीर फेंका था कहीं पर दिल निशाना हो गया l

उनके आंगन में चमेली खिल उठी है प्यार की ,
खुशबुओं का मेरे घर में आना जाना हो गया l

कल ही तो अखबार में निकली मोहब्बत की खबर,
कौन कहता है अभी किस्सा पुराना हो गया l

आ गया है ‘दीप’ की राहों में कोई अजनबी,
जब नज़र टकराई तो ये दिल दीवाना हो गया l

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