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वर्ष: 1, अंक 13, मई(द्वितीय), 2017



मेरे लिये तो नहीं थे

डॉ० अनिल चड्डा

होगे तुम जहाँ के लिये बावफा,
मेरे लिये तो नहीं थे।


परिभाषायें प्यार की खुद ही गढ़ते रहे,
और खुद ही उन्हें बदलते रहे,
अपनी राहों का हमसफ़र बना कर हमें,
खुद दूजी राहों पर चलते रहे,
कोई कहता रहे तुम्हे अपना खुदा,
मेरे लिये तो नहीं थे ।

खुद ही लिखते रहे कहानियाँ अपनी,
खुद ही पढ़-पढ़ कर रोते रहे,
बनाई फूलों की सेज अपने लिये,
हम काँटों पर थे सोते रहे,
हर किसी के लिये बने रहनुमा,
मेरे लिये तो नहीं थे।

नाँव चलती रही तूफाँ आते रहे,
डूब-डूब कर कनारा हम पाते रहे,
वो गीत गाते रहे सावन-भादों के थे,
हम बरखा में आँसू बहाते रहे,
जग की खुशियों के बने थे तुम खैरख्वाह,
मेरे लिये तो नहीं थे।

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