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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

अफवाहों के पैर में ....

सुशील यादव दुर्ग

सावधान रहिये सदा ,जब हों साधन हीन। जाने कल फिर हो न हो,पैरों तले जमीन।। # अफवाहों के पैर में ,चुभी हुई जो कील । व्याकुल वही निकालने ,बैठा आज 'सुशील' ।। # अफवाहें मत यूँ उड़े ,मन हो लहू-लुहान । मंदिर सूना भजन बिन,मस्जिद बिना अजान ।। # मेरे घर में छा गया, मेरा ही आतंक । राजा से कब हो गया ,धीरे-धीरे रंक ।। # हाथ लगी जब चाबियां ,निकले नीयत-खोर । बन के भेदी जा घुसे ,लंका चारों ओर ।।


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