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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

तुम्हारी महफ़िल में
और भी इंतज़ाम है

सलिल सरोज

तुम्हारी महफ़िल में और भी इंतज़ाम है या फिर वही शाकी,वही मैकदा,वही जाम है शायर बिकने लगे हैं अपने ही नज़्मों की तरफ पुराने शेरों को जामा पहना कर कहते नया कलाम हैं आप शरीफ न बन के रहें इन महफिलों में वरना शराफत बेचने का धंधा सरे-आम है रूमानियत,शाइस्तगी,मशरूफियात बेमाने हो गए जाइए बाज़ार में,ये बिकते वहाँ कौड़ी के दाम हैं इस पेशे में जिगर देके भी तो गुज़ारा होता नहीं शायद इसीलिए शायर और शायरी बदनाम है


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