मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

रो दिए

सलिल सरोज

वो सीने से लगकर यूँ रो दिए जितने भी पाप थे,सारे धो दिए छूके अपनी जादुई निगाहों से जवानी के कितने वसंत बो दिए हर पल हीरा हर पल जवाहरात अपनी ज़िंदगी के पल उसने जो दिए साँसों के महीन धागे में चुन चुनकर तासीर के बेशकीमती मोती पिरो दिए माँगने की इन्तहां और भी होती है क्या जो इशारा किया,झोली भर के सो दिए मुझे खुदा ही बना दिया अपनी महब्बत से खुदको दरिया सा मुझ समन्दर में खो दिए


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें