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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

जाना कहाँ है

महाराजा जीलानी

रास्ते मुख़्तसर मंज़िलें बेनिशाँ, हमको जाना कहाँ है ख़बर ही नहीं!! जब चले थे सफ़र में तो ये हाल था, अपनी तन्हाई थी और कुछ भी नहीं!! साथ छूटा तो दिल में यही थी कसक, बस ख़ुदा ही मिले और कोई नहीं....!! मुश्किलों का वो मन्ज़र नहीं भूलता, अपनी खुद्दारी थी और कुछ भी नहीं!! खुद ब खुद इल्म होता रहा इक मुझे, पर्दे हटते गए और तमाशा कोई नहीं!! बेबसी भी ख़ुदा की रज़ा ही तो है, लाख कोशिश करो हाथ कुछ भी नहीं!! वक़्त की शोहरतें वक्त की बेबसी, वक्त से बढ़के दुनिया में कुछ भी नहीं!! वो तो अहबाब है वो है दुश्मन मेरा, बस ख्यालात हैं और कुछ भी नहीं!! दो घड़ी के लिए जब से तुम मिल गए, दिल बहल जाता है और कुछ भी नहीं!! अपनी दुनिया मे हर कोई मशगूल है, ज़िन्दगी है यही और कुछ भी नहीं!!! बाँट कर सारी खुशियों को अहबाब में, ग़म की चादर समेटी और कुछ भी नहीं..!! सोचता हूँ कभी सब वो तन्हाई में, सच भी इक ख्वाब है और कुछ भी नहीं!!


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