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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

मदर्स डे के लिए
माँ प्लस माँ = दुर्गा

डा नीना छिब्बर

बैंक की कर्मठ उच्च अधिकारी रजनी आज चार साल बाद उसी अस्पताल के उसी कमरे मे ,उसी नंबर के पलंग पर आराम कर रही थी पर तब और अब में कितना अंतर था। उसे आज भी याद है जब उम्मीद की पहली उल्टी आते ही सासू माँ ने नजर उतारी थी। रजनी भी खूब खुश थी,पर रात को कमरे मे आते ही राजन ने उसकी खुशी पर कुठाराघात किया।अपनी अस्थायी नौकरी ,बच्चे की अच्छी परवरिश ,भविष्य की कठिनाइयों का ऐसा भावनात्मक मोहजाल बिछाया कि सारे सपने चकनाचूर हो गए।

"क्या रजनी कुछ समय दो मुझे तुम्हारे बराबर कमाने का,अरे माँ तो पुराने जमाने की हैं , तुम तो समझदार हो।फिर बच्चे तो अपने हाथ में हैं। आगे ध्यान रखना। शब्दों की चिंगारियों ने जीव लील लिया। आज फिर जब दुबारा नयी आस जगी तो रजनी ने राजन को फोन पर खुशखबरी सुनाई। दूसरी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं। फिर रात को शयनकक्ष मे राजन समझा रहा था,"तुम्हारी पदोन्नति की तारीख करीब है, मातृत्व अवकाश तो ठीक पर, नये घर की किशते, कार लोन ए.सी. ओह कभी सोचा कितने रूपयो का नुकसान होगा एक पदोन्नति आगे बढने से। तुम तो खुद समझदार हो।रजनी आश्चर्य चकित थी सारे आंकड़े तैयार थे राजन के पास ,नही थी तो आत्मियता। सोच लो जीवन तो समझौते से चलता है।अपनी बात कह सो गया ।

रजनी का शरीर, आत्मा ,दिमाग सब शून्य। गहरे अंधेरे मे किस जुगनू का हाथ थामे ,क्या माँ जी।. बाहर आयी माँ कमरे मे सो रही थी। हिम्मत न हुँई जगाने की ,निढाल कदमों से लौट गई। अनुभवी माँ बिस्तर पर लेटी सब भाँप गई। प्रातःकाल राजन ने माँ से कहा कि आज रजनी को अस्पताल ले जा रहा हूँ ,नार्मल चेकअप के लिए तभी माँ ने भी दृढता से रजनी का हाथ थामा और आँखों की चमक से दुलराते हुए कहा कि मैं ले जाती हूँ। तू अपने काम पर जा। बहू की चिंता मुझ पर छोड़।

राजन ने लाख तर्क दिए पर माँ ने माँ का हाथ थामा और रजनी को वह जुगनू दिख गया। चिंता काहे की औरतों का काम औरतें संभाल लेंगी। आप तो आफिस जाईए। रजनी माँजी के गले लग कर रो पडी । पगली आराम कर ,खुश रह,बधाई ले व दे


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