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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

शूटिंग

सुरेश सौरभ

"पुताई सही नहीं है, पेंटिंग सही नहीं है। किताबें भी कम हैं। कामन गर्ल्स रूम पर ,कामन गर्ल्स रूम लिखा नहीं है ‌। यह देखो कितना यहां गंदा लिखा है। यह क्या लिखा रखा है? बढ़िया-बढ़िया लिखाइए ताकि लगे आप महाविद्यालय चला रहे हैं । ऐसे हौच-पौच चलाने से अच्छा है कि आप न ही चलाएं?

तीन सरकारी अध्यापिकाएं वित्तविहीन महाविद्यालय के प्रबंधक और प्राचार्य पर बहुत जोर-जोर से भड़क रही थी, वे विश्वविद्यालय के पैनल में स्थाई मान्यता के लिए महाविद्यालय में निरीक्षण कर रही थीं। प्रबंधक-प्राचार्य उनकीं बड़ी चिरौरी कर रहे थे, पर वे तमाम कमियां निकाल-निकाल कर लगातार उन्हें झाड़े जा रहीं थीं और मान्यता न देने की बात कर रही थीं। उनमें से सबसे उम्रदराज तेजतर्रार अध्यापिका तैश में बोलीं-आगे सब सही कराइएगा तब स्थाई मान्यता के लिए हम लोग आएंगे और तभी फोटोग्राफी वीडियोग्राफी कराई जाएगी। इस समय कुछ नहीं होगा। टका सा जवाब देकर वे सब चली ही थीं , तभी प्राचार्य ने उन्हें रोककर सब कुछ सात दि‌न में सही कराने का समय मांगा, बड़ी खुशामद की, तब उन्होंने समय दे दिया था ।

सात रोज के बाद वे तीनों देवियां उस महाविद्यालय में फिर प्रकट हुईं। चारों ओर सब कायाकल्प हो चुका था । गजब का रंग-रोगन हो चुका था, पराई मांगी-जांचीं चीजों से महाविद्यालय नया-नया दुल्हन सा चमक-दमक रहा था। जिसे देखकर तीनों देवियां खुश हुईं फिर फटाफट फोटोग्राफी वीडियोग्राफी शुरू हो गई। कुछ समय बाद शूटिंग पूरी हो गई। वे सब चलने को तैयार हो गईं और अपनी- अपनी गाड़ियों की ओर बढ़ने लगी तभी प्रबंधक और प्राचार्य उनकी ओर दौड़े तब बड़ी दीनता से प्रबंधक और प्राचार्य की ओर वे तीनों देवियां देखने लगीं तब प्रबंधक ने उनकी दीनता को ताड़ते हुए, थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा -मैडम जी आप लोग जरा 10 मिनट के लिए कार्यालय में आ जाएं।' देर हो रही है ,देर हो रही है यह कहते हुए,तीनों देवियां दो महापुरुषों के पीछे ऐसे तेजी भागी जैसे पतंग के पीछे डोर भागती है। बाहर खड़े महाविद्यालय के सारे कर्मचारी इस देवयात्रा की वापसी देखने को अधीर थे और प्रश्नवाचक दृष्टि एक-दूसरे को ताक रहे थे। कोई दस मिनट के बाद प्रसन्नता से खिलखिलाते हुए कार्यालय के बाहर वे निकलीं। अब उनके चेहरो पर दीनता और किसी शिकायत का भाव न था। क्योंकि अब उन्हें शूटिंग का भुगतान किया जा चुका था और इसी भुगतान के आधार पर मान्यता की पिक्चर तैयार होगी। भड़-भड़ करने वाली देवियो ने इन सात दिनों के बीच में प्रबंधक के बार-बार फोन करने पर कालेज को सजाने-संवारने का तरीका बता चुकी थीं, जिससे यह पिक्चर पूरी हो सकी।


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