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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

दाग़

शुचि 'भवि'

'कितनी ख़ूबसूरत लग रही हो,नज़र न लगे।", कामना ने रेनू को कार में बिठाते हुए कहा।

रेनू बेइन्तहां रूपवती थी, वर्ण,कद, काठी, रूप ,आवाज़ सबकुछ ही मानो ईश्वर ने खुले हाथों दिया था उसे।अपने इस रूप को वो सलीकेदार और क़ीमती वस्त्रों से निखारती भी ख़ूब थी।महँगी वेशभूषा का रखरखाव भी वह बहुत ही तन्मयता से करती थी।

दूसरी ओर कामना इसके बिल्कुल विपरीत थी।

श्यामल वर्ण की, स्थूल शरीर धारी, मनमौजी तरीके से वस्त्र पहनने की शौकीन,

मगर उसकी उन्मुक्तता,सरलता,सच्चाई,और मदद की भावना उसके शरीर और रूप को ढक लेते थे।

बच्चे के प्रथम जन्मदिवस की पार्टी थी।कॉलेज के मित्र सभी इकट्ठे हो रहे थे,इसलिए एक ही कॉलेज से पढ़ी कामना और रेनू एकसाथ ही पार्टी में जा रहीं थीं।

"इडियट,अंधी हो क्या?दिखाई नहीं देता?पूरी दाल मेरे कपड़ों पर गिरा दी हो।ये दाग़ तुम्हारा बाप निकालेगा।", अचानक ही पार्टी में सन्नाटा छा गया था।एक छोटी सी बच्ची दौड़ते हुए रेनू से टकरा कर सहमी खड़ी थी।

रेनू की आवाज़ सुन कामना भी दौड़ी आयी थी।ख़ुशनुमा माहौल चिर शांति में तब्दील हो चुका था।

दाग़ वाकई अब कोई नहीं निकाल पायेगा।


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