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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

असली हक़दार कौन ?

जय प्रकाश भाटिया

रात के बारह बज रहे थे, दिसंबर की सर्द रात, शर्मा जी का मोबाइल बज उठा, ऐसे में मन में कई विचार उभर आये, क्या हो गया इतनी रात, लेकिन शर्मा जी के फ़ोन उठाने से पहले ही फ़ोन बंद हो गया. नंबर देखा तो यह उनके परम मित्र गुप्ता जी का फ़ोन था , वापिस फ़ोन मिलाया पर फ़ोन उठा नहीं. अब तो शर्मा जी का मन बैचैन होने लगा, गुप्ता जी का घर ज्यादा दूर नहीं था, शर्मा जी ने अपनी गाड़ी निकली और भगवान् का नाम लेकर चल दिए. गुप्ता जी के घर पहुँच कर घंटी बजाई पर कोई जवाब नहीं, अंदर लाइट जल रही थी, किसी तरह से झाँक कर देखा ,पर कुछ समझ नहीं आया. अब तो शर्माजी की चिंता बढ़ने लगी. कॉलोनी के चौकीदार को सामने पाकर उसे बुलाया और फिर दो पड़ोसियों को जगा कर , ज़ोर लगा कर दरवाज़ा चिटखनी तोड़ कर खोल दिया... सचमुच उनके पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन खिसक गयी, गुप्तIजी बेसुध फर्श पर गिरे पड़े थे, हलके हलके नब्ज़ चल रही थी, शायद हार्ट अटैक हुआ है. शर्मा जी ने तुरंत उन्हें कार में डाला और शहर के बड़े प्राइवेट हस्पताल में ले गए. लगभग १५ मिनट बाद डॉक्टर ने बताया की हार्ट अटैक आया है.. हम पूरी कोशिश में हैं और हार्ट स्पेशलिस्ट को भी फ़ोन करके बुला लिया है,

खैर हार्ट स्पेशलिस्ट भी जल्दी पहुँच गए , और जाँच के बाद बताया की हालत बहुत नाज़ुक है, हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, आप इंतज़ार कीजिये.

थोड़ी ही देर में एक नर्स ने कुछ सामान और दवाइयों की लिस्ट दे दी और कहा की यह सब अंदर स्टोर में ही मिल जाएंगी, स्टोर २४ घंटे खुला रहता है, और आप १०,००० /- रुपये एडवांस जमा करा दे की इलाज शुरू किया जाये.

अच्छा हुआ की शर्मा जी की जेब में क्रेडिट कार्ड था , उन्होंने तुरंत नर्स के कहे अनुसार दवाइयां ला दी और पैसे भी जमा करा दिए और बाहर बेंच पर आकर बैठ गए .

उनको सबकुछ याद आ रहा था , शर्मा जी और गुप्ता जी एक ही विभाग से कुछ साल पहले रिटायर हो कर आराम की जिन्दगी बिता रहे थे , गुप्ता जी की पत्नी का देहांत हो चुका था, के दो बेटे मुंबई और भोपाल में अच्छी प्राइवेट नौकरी में थे और एक बेटी इसी दिल्ली शहर में ब्याही थी.

शर्मा जी ने सुबह 5 बजे बेटी को फ़ोन कर दिया और सारी बात बता दी , एक घंटे में बेटी भी हस्पताल पहुँच गयी ,

हार्ट स्पेशलिस्ट न जाने कब चले गए थे , ड्यूटी डॉक्टर ने बताया की वेंटीलेटर लगा दिया है, अगले २४ घंटे नाज़ुक हैं, बेटी से नंबर लेकर शर्मा जी ने उनके दोनों बेटो को फ़ोन कर दिया और सारी बात बताई. दोनों बेटो ने कहा की हम भी पहुँच रहे हैं.

लेकिन अगले दिन शाम चार बजे अनहोनी हो गयी, गुप्ता जी इस दुनिया से जा चुके थे, नर्स ने आकर बताया और कहा की डॉक्टर साहिब से मिल लो. रोते हुए बहन ने दोनों भाइयों को फ़ोन मिलाया , उन्हें अशुभ समाचार दिया, दोनों भाई अभी तक नहीं निकले थे,पर सुबह तक पहुँच जायेंगे ,कह दिया.

शर्मा जी के पास भी गुप्ता जी के दोनों बेटो के इंतज़ार करने के इलावा कोई रास्ता नहीं था, गुप्ता जी की देह को उसी हस्पताल के शव गृह में रखवा कर सब घर आ गए और बेटो का इंतज़ार करने लगे.

अगले दिन ऐसे तैसे दोनों बेटे भी शाम होने तक पहुँच ही गए और थोड़ा बहुत रो पीट कर वह कैसे पहुंचे इस का ही बखान ज्यादा करने लगे. शर्माजी ने दोनों भाइयों और बहन का सारी बातें समझाई और अगले दिन ११ बजे संस्कार का समय तय हुआ.

अगले दिन सुबह ९ बजे शर्माजी दोनों भाइयों और बहन को ले कर शवगृह से पार्थिव शरीर लेने चले गए. हस्पताल वालों ने पहले लगभग दो लाख का बिल थमा दिया और कहा की पहले इसे जमा कर दे

शर्माजी ने दोनों भाइयों को बिल थमा दिया , दोनों भाई पहले तो एक दूसरे का मुँह देखते रहे , फिर आपस में कुछ सलाह कर शर्मा जी से ही बोले...आपको इतने महंगे हस्पताल में लाने की क्या ज़रुरत थी, यहाँ तो लूट मची है , इन्होने कुछ नहीं किया, बस अपना मीटर घुमाया है, दोनों भाई और भी कुछ बोलते इस से पहले उनकी बहन शर्मा जी से बोली.. अंकल मैं आपको दो लाख रुपये दे रही हूँ, मैंने अपने पति को फ़ोन कर दिया है, वह पैसे लेकर पहुँच रहे हैं. .. और वह कुछ देर में पैसे लेकर पहुँच भी गए , १२ बजते तक संस्कार भी हो गया .अब शर्मा जी ने दोनों भाइयों और बहन को जो बताया वह सचमुच चौकाने वाला था ...शर्माजी ने भी दुनिया देखी थी, अब उन्होंने कहा ... मैं और गुप्ता जी एक साथ रिटायर हुए और दोनों को सर्विस और फण्ड आदि की मोटी रकम मिली , हमने वो रकम अपने दोनों के नाम से सयुंक्त फिक्स डिपाजिट में जमा करदी और यह शर्त लगा दी की एक के न रहने पर ही दूसरा यह पैसा निकाल सकेगा, आज यह रकम लगभग १५-१६ लाख हो चुकी है, जिसमे आधे लगभग ८ लाख गुप्ता जी का है जिसे मैं गुप्ता जी की बेटी को दूंगा , और हाँ, हस्पताल में मेरी बहुत जान पहचान थी, उन्होंने पूरी कोशिश की, और बेटी को २ लाख वापिस करते हुए बोले .. हस्पताल का बिल केवल २७०००/- का था , जो मैंने दे दिया, यह सब नाटक मैंने इसलिए रचाया कि मैं जान सकूं की गुप्ताजी के पैसों का असली हक़दार कौन है,

गुप्ता जी की बेटी अंकलजी अंकल जी करके शर्मा जी के गले लग कर रोने लगी , और दोनों भाई एक दूसरे का मुँह देखते हुए वहां से खिसक गए.


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