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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

कुहरे भरी आग

कवि आनन्द सिंघनपुरी

बरसात का मौसम था।मिट्टी के बने घर व छप्पर की छत पर गिरते हुए घनघोर, मेघ गर्जना से बरसती बारिश की बूंदे पड़ रही थी।छत्त से कहीं-कहीं से बारिश की बूंद टपक रही थी। छत से टपकते बूंदों को मिट्टी के घड़े रख बारिश बन्द होने का इंतजार था। परन्तु काफी समय होने को हैं बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। रात के करीबन आठ बजने को था। इतने में रामदुलारे फटी छतरी ले घर आता हैं घर की छत देख गरीबी का रोना रोता हैं। पास रखी चारपाई में बैठ माथा पकड़ सोचता है -"काश पक्के मकान का स्वप्न पूरा होता तो ऐसी दशा आज देखने को न मिलता ।लेकिन हाय रे मेरी फूटी क़िस्मत।"

इतने में रामदुलारी जोर से रसोई घर से चिल्लाती हैं-"अजी सुनते हो! कितने बार कहा हैं सुखी लकड़ियां अलग से रख दिया करो।लेकिन मेरी एक भी सुनते नहीं।"

अब आकर चूल्हें में सुखी लकड़ियां डाल भूँक भी दो। नही तो कल से तुम घर का खाना बनाना। कब से भूंकते - भूंकते कुहँसो से मेरी आँखों से आँसू की धार बहने लगी हैं। और ऊपर से बरसती हुई तेज बारिश। जैसे जले पर नमक छिड़क रहा हो।

रामदुलारे- "अरे भाग्यवान! कुँहरे तो हमारे जीवन पर छाने लगे हैं। पता नही कब छटेगा। और तुम आग की बात कर रही हो।"

रामदुलारी-"अब प्रवचन सुनाना बन्द करो। तुम्हारे प्रवचन सुनकर आधी जीवन बीत गईं।

वही चूल्हें भूँक-भूँककर गीली लकड़ी जलाने की आदत पड़ सी गई हैं।


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