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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

मन और जल

अजय अमिताभ सुमन

एक बार की बात है , गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे.रास्ते में उन्हें प्यास लगी . उन्होंने अपने एक शिष्य से पानी लाने को कहा. शिष्य जलाशय की तलाश में आगे बढ़ चला. सुरज की दग्ध किरणों से परेशान होते हुए भी अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए आगे बढ़ता चला गया. रास्ते में एक पोखर मिला जिसमे कुछ बच्चे खेल रहे थे . शिष्य के जाने पर बच्चे भाग गए . शिष्य गौतम बुद्ध को पोखर के पास ले गया .गौतम बुद्ध की आज्ञानुसार शिष्य पानी लाने को तत्पर हुआ . पर गौतम बुद्ध ने उसे रोक दिया .

बच्चों के पोखर में खेलने के कारण पोखर ला पानी काफी गन्दा हो चूका था . अत: वो पानी पिने योग्य नहीं था . थोड़ी देर बाद पानी की गन्दगी पोखर के तल पे जाने लगी .शिष्य फिर पानी लाने को तत्पर हुआ.पर गौतम बुद्ध ने उसे फिर रोक दिया . प्यास के कारण सारे बेचैन थे . पर गुरु की अवज्ञा करने की हिम्मत किसी में नहीं थी. क्या पता गुरु उन सबकी परीक्षा ले रहे हैं?

काफी देर बाद पानी की गन्दगी बिल्कुल बैठ गयी और पानी साफ़ हो गया . अब गौतम बुद्ध ने अपने शिष्य को पानी लाने को कहा . फिर उन्होंने समझाया कि हमारा मन भी उस पानी के उस पोखर के समान है जिसमे छोटी छोटी बातों से हलचल मच जाती है . इसमें स्थिरता लाने का एक ही उपाय है इंतजार. समय के साथ मन में उठी भावनाओं की लहरें शांत हो जाती है .समय ही मन में उठी हर अस्थिरता को शांत कर देता है. मन की चंचलता का एक ही उपाय है धीरज पूर्वक प्रतीक्षा. गौतम बुध्ह के शिष्य उनका आशय समझ चुके थे.गौतम बुद्ध का काफिला आगे बढ़ चला.


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