मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

ख्वाब

विनोद महर्षि 'अप्रिय'

कुछ ख्वाब यूँ रुलाते है बनकर घाव तड़पाते है खोये से रहते है हम यूँ जब ख्वाब नहीं आते है। कौन सी दुनिया मे है हम मस्त है फिर मिलते है गम जानते है गहराई जीवन की क्यों देखते है ख्वाब हम। कभी अच्छे लगते है यह कभी सनकी बन जाते है कभी बादशाह दिखते है कभी हमे रंक बना जाते है। भगमभाग में सोचा नही राह हमने सही चुनी नही बन ख्वाबो के शहजादे हकीकत हमने देखी नही। उधेड़बुन यूँ चलती रही मुश्किल फिर बढ़ती रही जाना था सागर के पार लहरों में नौका फंसी रही। जाना कहाँ था रुके कहाँ ख्वाबों में हम चले कहाँ क्यों सपन सुनहरे देखे लक्ष फिर हमें मिले कहाँ। सोचे जब समय निकल गया हम किस डगर पर रह गए पाना था एक सुखद छोर लेकिन मंजिल से भटक गए। ख्वाब अक्सर जागते है दुष्टो को दूर भगाते है पहचान गलत होती है समय बीते पछताते है। काश वो ख्वाब सच होते जो हमे रोज खुशी देते है क्यों पहचान नही पाते है जो दरवाज खटखटाते है । गर अभी हम जाग सके तो लक्ष को हम पा जाएंगे ना खोये विलाशी ख्वाबों में सुखद जीवन बना पाएंगे।।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें