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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

उम्मीदें

शीशपाल चिनिया'शिशु'

जमाने के तानों से तंग हो वो अभी थक के रूका था। कहानी उस वक्त पूरी हुई जब वो हताश हो चुका था। अपनी दुनिया से टूटा वो खुद बिक चुका था। थार में खडे़ हिरण सा खुद से झिझक चुका था। कभी हरा - भरा खेत था आज बंजर बन चुका था। अपना ही दिल चीर लीया वो अब खजंर बन चुका था। जमाने की ठोकर खाकर कुछ उसने सिखा जरूर था। चिथड़ा बन गया अब वो जो कभी साबूत गरूर था। आईने की जरुरत थी अहसास ही नहीं हुआ। क्यों कि ये जमाना था जो अट्टाहास कर चुका था। धत् तेरी कहने वालों सुनो कुछ अलग उस की जंग है। गिरगिट बन गए आप भी अब देखो उसके कितने रंग है। बिखरे ही सही वो तन्हा अपने हालात सम्भालेंगा। किस्मत उसके बस की नही खुद को नये सांचे में ढालेगा। वो बद्सुरत ईसांन में हुँ वो बदलने वाला ईसांन में हुँ। चिड़िया की तरह सीधा नही बया सा उल्टा लटक चुका हूं। खुद की उम्मीदेँ नही टूटी कीतनी आशांऐ जागृत है वो बन नीड़ मेरा तुफानो का मुझे हौसला पहाड़ सा दे चुका है।


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