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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

युद्ध

शंकर सिंह

युद्ध मानव के खोपड़ियों मे नाचता है वैमनस्य स्पर्धा शक्ति का प्रदर्शन बनकर या स्वयं के वर्चश्व को बनाये रखने के लिए हर कोई ज़ब भी चढ़ता है ऊपर हथियारों के साथ वही बैठा युद्ध मुस्कराता है कि शांति मे भी लोग पूजते है उसे युद्ध कही और नहीं समाज के उस हिस्से मे है जिस हिस्से मे हम मानव को ही मानव का प्रतिद्वन्दी समझते है !


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