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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

लोकतंत्र का चरित्र

शंकर सिंह

शासक राजा बने रहता लोकतंत्र मात्र वोटतंत्र हो जाता यही चक्र चलते रहता जनता पीसते रहती इन दो पाटों के बीच चक्की से धुआँ निकलता ताजे गेहूं की बालियों की खुशबू दूर दूर तक फ़ैल जाती है रोटी की उम्मीद में एक ओर दौड़ लगाते है लोग वहां राजा हाथों में हथियार लिए पहरेदार बैठाये रहता !


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