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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

भरी हुई आँख

सविनय शुक्ल

मैं सोच रहा हूँ तुम्हें, मैं सोच रहा हूँ, कि तुम भी सोच रही होगी मुझे शायद मैं गलत हूँ या सही भी मिलने की उत्सुकता में भर आएँगी मेरी आँखें बार-बार और मिलने पर मुस्कुरा दोगी तुम भर आएँगी तुम्हारी भी आँख, पर आँखें मूँद लम्बी साँस भर, छुपा लोगी कई-कई बार पर मैं देख लूँगा तुम्हारी भरी हुई आँख फिर भरी आँखों से देखेंगे, एक दूसरे की ओर हम भूल जायेंगे काल को, अन्तराल को हम भूल जायेंगे धरती को, आकाश को, और शायद हम भूल जायेंगे खुद को भी पोछेंगे मुस्कुराते हुए, एक दूसरे की भरी हुई आँख फेरेंगे चेहरे पर हाथ कई-कई बार, देखेंगे एक-दूसरे को देखते हुए पर मैं तो सोच रहा हूँ न तुम्हें और शायद तुम हो यहीं-कहीं


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