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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

बची हुई उसकी साँसें

रामदयाल रोहज

सबका पेट भरने वाला आज खुद भूखा सोया है जला ना चूल्हा उसके घर यह देख गगन भी रोया है घरनी अपने मासूम को रोते रोते पुचकार रही उजङ गया है खेत हमारा सब मेहनत बेकार गई ओले आँधी तूफानों ने पल में खुशियों को छीन लिया दया ना आई ईश्वर को पकी हुई रोटी को छीन लिया और इधर से कर्जकूप में दिन-दिन दबता जाता है सूद की गंदी लीद ऊपर से डाल रहे ऋणदाता हैं फटा कलेजा कृषक का अब उसकी साँसें फूल गई बची हुई उसकी साँसें सरकार भी वादे भूल गई


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