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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

बंजरभूमि

रामदयाल रोहज

बङे बङे टीले सर्पांकित रही सदा बूँदों से वंचित और अकालों से आतंकित पता नहीं किससे है शापित वंध्यापन का सहती ताना दर्दभरा है उसका गाना कब मालिक ने है पहचाना त्याग दिया है बिना बहाना चहुँओर सर्पदंश सहती है ना मरती है ना जीती है आजीवन तन्हा रहती है अब कौन सुने जो कहती है |


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