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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

स्वर्ण विहंग

राजेश कुमार यादव

मुझे स्वतंत्र अब हो जाने दो। मुझे पंख अब फैलाने दो।। मुझे जग में प्रीति बढ़ाने दो। फूलों सा खिल जाने दो।। बन्द पिंजरे में क्या कर सकता हूँ। केवल तन को मैं ढँक सकता हूँ। मेरे बिन उदास है अंबर, मेरे बिन उदास है धरती। मुझे नभ में अब छा जाने दो। फूलों-सा खिल जाने दो।। मुझे पराधीन बनाओ मत। मुझे लालच की तस्वीर दिखाओ मत। इतना ज़रा अधीर बनाओ मत। मुझे स्नेह अलख जगाने दो। फूलों-सा खिल जाने दो।। मधुरिम वचनों में उलझाओ मत। सिर्फ हर्ष की लोरियाँ सुनाओ मत। झूठे वादे देकर बहलाओ मत। मुझे अपनाउजड़ा चमन सजाने दो। फूलों-सा खिल जाने दो।। देखो नदियों में धारा बहती। खिलती किरणों से वो कहती। मैं किसी की आस न करती। मुझे नाव आगे ले जाने दो। फूलों-सा खिल जाने दो।। मुझे यहाँ न दिन रात पता है। पिंजरे में सहारा न कोई लता है। कोई बताए मेरी क्या खता है। मुझे लक्ष्य अपना पाने दो। फूलों-सा खिल जाने दो।।


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