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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

बीज

रागिनी स्वर्णकार(शर्मा)

बीज हूँ, अपने अंदर समेटे हुए सृजन महोत्सव..! धूप हो या छाँव सर्दी ,गर्मी ,बारिश..! सृजन की ललक लिए ढूढ़ता नमी..! गहन तमस को चीरता प्रकाश का बीज हूँ..! नहीं रोक पाता, कोई अंधेरा, प्रस्फुटित होने से..! फिर निरन्तर उठता ऊपर सकारात्मकता देता वातावरण को...! हवाओं को देता बल..! खुशबुओं को देता आधार..! प्राण वायु भरता दिशाओं में..! सृजन को रोक नहीं पाता... कोई अंधेरा..! बीज हूँ मैं...!


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