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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

तलाशते हुए

डॉ.प्रणवभारती

मैं अंधेरे से गुज़रती लड़ी हूँ रोशनी की जिसने देखे न जाने कितने संताप न हो सका आभास मन के भीतर बसे अंधियारे का----- बाहर के उजियारे से करती रही मोह कर न सकी विद्रोह---- रसवंती इच्छाओं से मटमैली धूल तक पीपल की छाँह से जंगल के शूल तक किया लहूलुहान ------ भावनाओं के समुंदर में भिगो दिया मैले कपड़े सा---- बनाया झाग उद्देश्यविहीन कार्य-कलापों का---- घिसती रही दोनों हाथों से साफ़ करने मैल अंधियारे का----- हाथ आए कुछ चिथड़े जिनमें से झांकती थी रोशनी---' अपलक देखती रह गई वो कड़वी सच्चाई जिसने घेरा था रोशनी को अंधियारे से---- चीथड़ों से झाँकता उजास खिलखिलाया मुुुझ पर पकड़ने को उजियारा ताउम्र लगाते टकटकी फट गई दृष्टि------ आज,तलाशती अपनी रोशनी खड़ी हूँ उसी मोड़ पर जहाँ से चली थी तलाशने भीतर की रोशनी!


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