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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

पावक हो गए लोग

पद्मा मिश्रा

लाल भभूका सूरज लगता, झुलस रहे धरती के प्राण, गर्मी की बेरहम दुपहरी, मांग रही है त्राण बादल को तरसे हैं नैना, बूंद बूंद की चाह, पीपल की छाया भी सिमटी, ढूंढ़ रही है छाँह. ज्वाला ही ज्वाला है तन में, हों कैसे शीतल गात? गर्म भट्ठियों सी तपती लू, ग्रीषम के उत्पात . गर्म स्वेद से क्या बुझ पाए, मन की शाश्वत प्यास. जल ही जीवन रटते रटते टूट रही है आस.. जल-अर्जन क़ि लिप्सा जितनी, उतने ही उद्योग, उस पावस की बाट जोहते, पावक बन गए लोग, नदिया सुख़ गई जल भीनी, उथली हो गई थाह, रेतीले तट सा जीवनहै, विकल हो गई आह. ओ मतवारे, कजरारे घन, प्यास बुझा हर मन की, अब तो आओ मन के नभ पर , तुझे कसम अंसुवन की


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