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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

बहुत दिनों के बाद ...

पद्मा मिश्रा

बहुत दिनों के बाद ,खिली है, पल पल कितनी सजाती धूप , सूरज का संदेशा लेकर , पात पात इठलाती धूप . गया शीत ,अब जगी उष्णता , मन में प्यास जगाती धूप . जल दर्पण में झांक रही है , लहरों से शर्माती धूप . नव प्रभात के स्वर्णिम रथ पर , किसी परी सी आती धूप , अंधियारे को जीत जगत में , शख की सुबह दिखाती धूप . घर -आंगन में चौक पूर कर , तुलसी को नहलाती धूप , चौबारे के ठाकुर जी को , झुक कर शीश नवाती धूप . राह -बाट ,गलियां ,गलियारे , सबसे प्यार जताती धूप , खलिहानों में उतर रही है , सूरज की शहजादी धूप ... अमराई में तनिक ठहर कर , गीत सुरभि के गाती धूप , सुन कर मंजरियों की गाथा , गंध गंध बौराती धूप . बंद झरोखों के अंदर भी , जहाँ तहां मुस्काती धूप , राग रंग की सभा सजाये , किस किससे बतियातीधूप , माया की छाया बन बैठी , इंद्रजाल फैलाती धूप , पगडण्डी पर बलखाती सी , धरती पर लहराती धूप ....


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