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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

हुंकार

ओम प्रकाश अत्रि

अपने श्रम को बेचने वाले श्रमिकों एक हो जाओ जैसे एक हो जाती हैं आग की लपटें अब नही है तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ भी । जकड़ा है तुम्हारा जीवन आर्थिक विकास के चरित्र से, तार-तार होकर जीवन चला रहे हो फिर भी मरते हैं क्यों तुम्हारे बच्चे भूख से? ढीली हो गयी है तुम्हारे शरीर की खाल काम की मार से, सूख गया है तुम्हारी नसों का खून पीला पड़ गया है तुम्हारा जिस्म और बैठ गयी हैं तुम्हारी आँखे। ऊपर से खड़ी है निगलने को तुम्हें मंहगाई मानो महाकाल की तरह रसना पसारे, सुख छिन्न हो गया है तुम्हारा होते विकास बदलते समाज मे। कुछ भी बिगड़ता नही है उनका जो दुहते रहते हैं तुम्हारी मेहनत को, तुम्हारे चीख कराह की आवाज़ उनके कानो में संगीत बन गयी है। हो रही है तुम्हारी हत्या दब गया है तुम्हारा खून उनके धन के दबाव से, बढ़ती जा रही है उनकी अमीरी तुम्हारी ही मेहनत से। आर्थिक लक्ष्य पूर्ण करने में लगे हैं वो लोग तुम्हारे ही श्रम से, सम्भलो! सम्भालो अपने कुटुम्ब को तोड़ दो शोषक और शोषित के अन्तर्द्वन्द को मिटा दो उनको जो खेलते हैं तुम्हारे जीवन से।


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