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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

मौसमी हवा

ओम प्रकाश अत्रि

हवा भी रुख देखकर बहती है मौसम के साथ, जाड़े में सर्द गर्मी में गरम झूम कर नाचती है बरखा में पानी के साथ। बसन्त में मादकता से भरी हरेक फूलों पर मड़राती भंवरों के साथ, नई-नई कलियों को उकसाती हंसने को कोपलों को देखकर मुस्काती वृक्षों के साथ। खेतों से इठलाती गेहूँ से बतलाती सरसो से लजाती फूलों के साथ, पकड़कर मटर को जोर से हिलाती फलियों के साथ। नदी में जाकर पानी से मिलकर थपाथप मचाती लहरों के साथ, खेतो में काम करते लोगों के पसीने को सुखाती झकोरों के साथ। पंखो पर बैठकर गाँव-गाँव घुमती परिंदों के साथ, पुराने छप्पर पर चढ़कर खेलती उसपर बिछे फूस को उड़ाती थपेड़ों के साथ ।


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