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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

बेरोजगारी की मार

ओम प्रकाश अत्रि

कितना समय गवां दिया इधर-उधर झंझट में, मालूम नहीं कोई पथ है इस जीवन-सागर में। जीवन की बहुमूल्य लालसा क्यों तकती है आशा में? खोना बचा नहीं है कुछ अब बहका-बहका हूं इस जग में। पथ को कितने भूल गया हूं कंटक को कितने झेल रहा हूं, भूल-भूल कर भूल गया हूं साहस अपना हार गया हूं। रोजी रोटी के खातिर मैं लक्ष्य बाजार में फंसा हुआ हूं , बढ़ती हुई बेरोजगारी में अपना इष्ट टटोल रहा हूं । कुछ पता नहीं मेरे नयनों में कितने आंसू हैं अभी बाकी, जीवन यापन के चक्कर मे कितने को मैं गवां दिया हूं। जीवन कितना बीता मेरा और अभी कितना है बाकी, नित-रोज रोजगार की हलचल सुन-सुन कर मैं हार गया हूं।


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