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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

इस धरती को बचा लो

निशा नंदिनी भारतीय

बचा सको तो बचा लो इस धरती को बचा लो। उठा सको तो उठा लो भीगी पलकों को उठा लो। सुनो इसकी चीख पुकार पीड़ा से कर रही चीत्कार। मत करो अब छेड़छाड़ बहुत हो गया अब खिलवाड़। रत्न दायिनी को बचा लो भीगी पलकों को उठा लो। भूमि हमारी जीवन दाता यह हमारी भाग्य विधाता। इसके बहुत हम पर उपकार सुन लो अब इसकी पुकार। प्राण दायिनी को बचा लो भीगी पलकों को उठा लो। इसने हमारा जीवन गढ़ा अन्न, जल, वायु से बड़ा। सुंदर सलोनी यह प्रकृति हो रही अब इसकी विकृति। जीवन दायिनी को बचा लो भीगी पलकों को उठा लो। सब आवश्यकता करती पूरी पर मानव की तृष्णा अधूरी। मत करो तुम इसका भक्षण करें सब अब इसका रक्षण। आनंद दायिनी को बचा लो भीगी पलकों को उठा लो। वन उपवन की करो रक्षा विषैली गैसों से सुरक्षा। तड़प रहे तुम जल विहीन जैसे तट पर बैठी मीन। मोक्ष दायिनी को बचा लो भीगी पलकों को उठा लो।


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