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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

नेताओं का क्या...

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नेताओं का क्या... इस दल न सही तो उस दल बस कुर्सी मिल जाये | और तुम (जनता) क्यों आपस में लड़ मर रहे हो तुम्हें तो वही करना है जो कर रहे हो / वहीं रहना है जहाँ रह रहे हो | तुम्हें (जनता) आज ऐसा एहसास हो रहा है जैसे तुम्हीं प्रत्याशी हो एहसास तो होगा ही नेताजी ने दोनों हाथ जोड़कर तुम्हारे नाम के पीछे ‘जी’ जो लगा दिया | पर तुम (जनता) भी कितने भुल्लकड़ हो ऐसा तो 1947 से ही चलता आ रहा है तुम्हारी औकात एक फुटबॉल से अधिक नहीं... ये चुनावी मौसम तो बीतने दो फिर पता चलेगा तुम्हें (जनता) तुम्हारी असली औकात का आज तुम भूल गये हो और भूलोगे क्यों न भारत के पानी में भुलाने की बीमारी जो है | जब कुछ सही करने का मौका मिलता है तो बहक जाते हो नेताओं के मीठे बोलों में और फिर एक बार मौका निकाल देते हो... गुलाम के गुलाम बने रह जाते हो |


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