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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

सोया मेड़ पर अन्नदाता

मनसाराम बैरवाल

सोया मेड़ पर अन्नदाता, कभी आता जुमला आवारा पशुओं का कई बार डराता है विधाता, अपनी आँखें फाड़-फाड़ कर फिर भी डटकर खड़ा है कृषक।। अरे मैं तो दूब हूं उस चारागाह की, जहां अश्व करते है विचरण। दिन में खायी पैरों से रौंद दी, फिर से हरी हुई, लगी जब सूर्य की किरण।। अरे रुक मत मेरे भाई, सब टिका है हम लोगों पर। क्या कर लेंगे, जो बुरा चाहे, कृषक का तो जीवन ही है घाटे पर।। कभी डराती बिजली की चकाचौंध, ईश्वर को खुशी उसकी कब भाती है। वर्षा मौसम में न करके , बरसाता है जब उसकी फसल पक जाती है। बच्चा उसका अब भी मधुर मधुर मुस्काता सोया मेड़ पर अन्नदाता सोया मेड़ पर अन्नदाता ।।


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