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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

स्वर्ग - धरा

कुंदन कुमार

सफेद मोती सी बिखरी हुई ओंस की बूंदें पर्वतों के उस पार झांकती भोर की लालिमा इंद्रधनुषी फूलों की घाटियां, है ले रही अंगारियाँ पत्थरों से खेलती उफनती नदी, है कर रही अटखेलियां सफेद चादरों सा पसरा ज़मीन पर ये घटा बर्फीली चोटियों से छन - छन कर आती ठंडी हवा झरनों से उड़ - उड़ कर बूंदें पड़ती हुई गलों पर शीतल नैनों को दिखाती हुई मनोरम छटा शोर उड़ रही हर तरफ, वायु में घुलती हुई आवाज ये लयबद्ध है, कानों में उतरती हुई पत्तों की सरसराहट, झरनों की झरझराहट चिड़ियों की चहचहाअट, रागनी गाती हुई आवाज ही आवाज है किन्तु सब खामोश है हो अकेले ही खड़े, शांत मन का साथ है पहचान सकते जहाँ, खुद की जो पहचान है क्या खूब सजा भूखंड ये, स्वर्ग सा एहसास है मंद मंद बहती हवा, है छू रही कौमुदी को झूमती ये डालियाँ, है दमक रहीं स्वतः जो हिमकर सुधा में डूबकर, जो सुबह है खिल गया ले उड़ा सौरभ समीर, चूमता सुमन को क्या कमीं है रह गयी, जो मिला मुझको नहीं स्वर्ग जिसका नाम है, वो धरा तो है यहीं फिर ये मन बेचैन क्यूँ, क्यों ये पल - पल घूमता है ढूंढता पीछे जिसे, वो तो एक निशान है


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