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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

फुरसत नहीं

कमला घटाऔरा

फुरसत नहीं अभी मुझे - मैं सोचूँ तेरे प्यार के बारे में आँखों से हटते नहीं देखे जो , भूख से बिलखते बच्चे ठिठुरते अधनंगे तन बर्फ की सिला जैसी जमीन पे बिन बिस्तर सोये । सोचना है कैसे दूर हो उन की पीड़ा ? फुरसत नहीं अभी मुझे - लिखूँ कुछ छंद मन भावने जीवन के स्वर्ण पलों के शृंगार रस भरे प्रेम गीत एकान्त पलों को सुरभित करें । मुझे पोंछने हैं आँसू उस माँ के जिसकी जन्मी अजन्मी बेटी जीने के हक से बंचित रह गई कबूली नहीं है समाज ने । फुर्सत नहीं अभी मुझे - इन्सान के अन्दर मर चुकी है , जो इन्सानियत ,मुझे सोने नहीं देती मेहनतकस की मारी मेहनत का दर्द बहुत सताता है मुझे गरीब के सिर की छीनी जाती छत कुछ कर गुजरने को झिंझोड़ती है । कैसे हो इन्साफ उन के संग युक्त कोई निकालनी है । फुरसत नहीं अभी मुझे - तुम पुकारो , आऊँ दौड़ी चली अभी मन बहुत विचलित है तड़प रहा मछली सा जल तलाशता तप्त धरा पर उसे किसी पोखर में पहुँचा दूँ । कुछ सोच लूँ समाधान ऐसा अमन चैन से रहे हर प्राणी । अपने सा समझे सब को हो संसार में भाईचारा । तब समय निकालूँगी , बिन पुकारे चली आऊँगी । मत आवाज देना तब तक।


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