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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

दिल से देता हूँ वोट

कवि जसवंत लाल खटीक

मैं सबको सुनाता हूँ लेकिन , मैं हूँ बहरा , किसी की नहीं सुनता मैं ये , आज कह रहा । मैं दिल से देता हूँ वोट , पैसों से नहीं , मेरा वोट है मेरा हक , शान से कह रहा ।। ये चुनावी हथकंडे है , ये तो रोज आएंगे , ये हाथो को जोड़ कर , हमारे पाँव दबाएंगे । इन लोगो की बातो में , तुम कभी ना आना , ये हाथ जोड़ने वाले फिर , हमको दबाएंगे ।। राजनीति के ये चोंचले है , सम्भल जाओ तुम , मीठे-मीठे है बोल इनके , सम्भल जाओ तुम । ये आज बोल रहे , कल चुप्पी साधेंगे , ये राजनीतिक जुमला है , सम्भल जाओ तुम ।। काका , दादा और भैया , तुम्हे कह के बुलाये , चन्द पैसो का लालच देके , तुम्हे पास बुलाये । पल भर में बदल देते है ये , अपना यह रुप , एक साइन करने के लिए , रोज दफ्तर बुलाये ।। इनका कोई सगा नही, कोई दोस्त नही है , बस पैसे के भूखे है , सिर्फ होश यही है । इनको नही मतलब तुमसे , जीत जाए तो , ये चुनावी गिरगिट है, इनका दोष नहीं है ।। वोट पर है अधिकार , देना तोल-मोल के , गलती से भी ना देना ,कभी बोतल खोल के । एक वोट तुम्हारा बनाता है, अच्छी सरकार , फिर पांच साल तक , जीना दिल खोल के ।। सफेद कुर्ते वाले रोज , मिल ही जाते है , राजनीति के दाव पेंच , लड़ ही जाते है । इन सबका नुकसान , आम आदमी भरे , ये राजनेता रोज नए , पकवान खाते है ।। " जसवंत " कहे , राजनीति बुरी नही है , इन नेता की ईमानदारी , पूरी नही है । स्वच्छ राजनीति अपना ले तो, बात ओर बने , सोने की चिड़िया बने भारत , दूरी नहीं है ।।


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