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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

सेना और नेता

धर्मेन्द्र कुमार

पर्वतों हिमालय की चोटियों पे खेल तू देश के जवान गोलियों को झेल तू, खेल ये जीवन मरण का दिवालियों में खेल तू होलियों में धो दे सिंदूर खेल-खेल में। देश की विडम्बना मरे जवान ग़रीब का तनुज हुआ शहीद बताओं कभी अमीर का ? नेता, अफसर और सांसदों एक सुत दो जहान को या हथेली पर लेकर आओ ख़ुद ही अपनी जान को। पीर-पराई पता चले कल्याण होता देश का तब लाल न शहीद होता इतना अपने देश का, औकात का तुम्हारी रणभूमि में पता चले हकड़ते कितना मंच पर सीमाओं पर पता चले। तपते बालू, बर्फिली पत्थरों पर चल के तू देख ले नानी याद आएगी बिन पानी एक दिन रह के देख ले, जंगल पहाड़ों में एक दिन भूखा रह के देख ले एक दिल ए0सी0 कार छोड़़ हल चला के देख ले। तेरी कौन-सी नीति ये कैसा प्रपंच है ! एक के बदले दस सिर लाने का कैसा षडयंत्र है, विधवा सुहागिने, सुना माँ का कोख है समझौता करने जाता किस बात का परदेश है ? क्यों चाहता नहीं मिटाना अन्याय अपने देश से ? चाहों तो विध्वंश कर दो अन्यायियों का देश से, वोट के लिए करता क्यों बर्बाद अपने देश को ? क्यों धर्म, जाति, सम्प्रदाय में विभक्त करता देश को ? उस अबला माता से पूछ जिसने खोया अपने लाल को, विधवा हुई सुहागिनों से पूछ जिसने धोया अपने माँग को, देख, हुये बेसहारा उनके बच्चें और अनाथ को पैसों से ला सकता क्या तू पुनः उनके प्राण को ? बुझ गया जिनके घर का चिराग तम उनका संसार है तू मौज़़ करता, लूट करता फिर भी नामदार है हत्या, बलात्कार, झूठ बोलता फिर भी ईमानदार है नौकर होकर बन बैठा जन का राजा है। कैसा अपना जनतंत्र है, ये कैसा अपना न्याय है !


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