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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

प्रियतमा की यादें

धर्मेन्द्र कुमार

अब यादों का अवलम्ब धरा पर जीवन मरण का जंग यहाँ पर। मृत्यु ने कैसा खिलवाड़ किया मुझसे पहले प्रियतमा पर वार किया काल तूने मुझे बदनाम किया मुझे जीवित छोड़ कृतघ्न का काम किया। तेरी कायरता को मैं जानूँगा रण छोड़ कर न भागूँगा आततायी मुझ पर वार कर उठा कटार तू पहले प्रहार कर। प्रियतमा की यादें जब-जब आती है सुख-दुःख का रस घोल वृहल कर जाती है। काली आँखें‚रश्मि मुख पर एक जादू था विहसित छवि और होठों पर लाली था कबरी‚ गदरायें भरे बदन, अंगों में फ़ूर्ती मोहनी अदायें मन को ख़ुब लुभाती थी। जीवन ख़त्म उनकी यादें बची थोड़ी-थोड़ी मेरी भी सांसे बची नयनों में मिठी स्मृतियों का अवशेष हृदय में उनकी अबाध ख़्यालें बसी। रो-रो कर व्यथा कह पाता जान विरह में तेरे मर पाता। जो प्यार किया वहीं जानेगा बाकी सब झूठा मानेगा विरह-वेदना क्या कोई पहचानेगा एक टूटा दिल ही जानेगा। अपलक नयन कब के सुख गये नीर आँसू बनकर रूक गये सारी चेतन-शक्ति छुट गयी प्रियतमा जबसे तुम दूर गयी। असह्य प्रियतमा की वियोग-विरह है जैसे जल में गिरता नाग-नवल है। वह मृत्यु शैय्या पर लेटी थी प्रेम-प्यार की चेरी थी व्याधियों ने ऐसे जकड़ लिया मानों, लता वृक्ष को पकड़ लिया। मुझसे विरह की आश में जल गयी जैसे वह आग में वह जीर्ण-शीर्ण सी हो गयी मृत्यु की गोद में सो गयी। देखो‚ मृत्यु ने मुझसे कैसा कपट किया प्रेम- दुःख को जाने बिन सनद किया। जाति-धर्म को छोड़ा था हमने भी नाता जोड़ा था मृत्यु ने फिर भी हूँकार किया प्रियतमा पर कैसा वार किया ! मृत्यु अगर अटल तो आनी थी मैंने भी की मनमानी थी लोक-लाज में फँस गया बिन देखे अंतकाल में रह गया। विरह-वेदना इनती प्रचण्ड क्यों हन्त! कि प्राण-पखेड़ू उड़ जाते है तुरन्त। क्या पता था मर जाएगी हँसते-हँसते चल जाएगी इतनी जल्दी भी कोई जाता है सनम को रूलाकर क्या भाता है? उसने मुझसे प्यार किया मुझपर ही ऐतवार किया मेरे विरह में प्राण त्याग किया हिना‚ तुने यह कैसा इंसाफ किया ? इतनी जल्दी था, तो मुझे भी ले जाती साथ जीने-मरने की सब कसम निभाती। पहले, अपने घर की रानी थी मुझसे मिलकर हुई बेग़ानी थी घरवालों की परवाह न की लड़ गयी उनसे‚ पर मुझसे इंकार न की। प्रेम सदा नहीं जीता है पड़ी भूमि पर हिना की चिता है तू जा मिली गगन के तारों में मैं भटकता हूँ आनन और पहाड़ों में। कैसे लगाम लगाऊँ उनके यादों पर भरोसा नहीं मुझे अपने किसी वादों पर। अब यादों में आनन्द बड़ा है भूत विचरण में अद्भूत मजा है प्रेम-वियोग की आग में जल जाऊँगा तेरी याद में। बात की तू पक्की थी दिल की खूब सच्ची थी कहती जो वो कर गयी बिछड़कर मुझसे सचमुच तू मर गयी। जान, रोज सपनों में तुम आती हो थोड़ी हँसी, और इतना क्यों रूलाती हो? मेरा स्थान रखना खाली आऊँगा में प्रियतमा हाली जाने किस मोह ने रोका है मरता हूँ, पर जीने को सोचा है। यह मोह कैसे तू तोड़ गयी किसके सहारे मुझे यहाँ छोड़ गयी जिसे देखे बिन न रह पाती थी उनसे ऐसे क्यों मुँह मोड़ गयी। विश्वास नहीं होता कि तू धरा से मिट गयी मैं नीचे ही रह गया‚ तू ऊपर कैसे उठ गयी ? मैं कायर हूँ‚ वरना मर जाता हिना‚ विरह में तेरी यौवन कर जाता केवल नाम नहीं सचमुच तू हिना थी कोयले में मिली अनमोल चमकता हीरा थी। तूने अपना वचन निभाया दूसरों के होने के पहले बदन मिटाया प्रेम-परिवार दोनों का धर्म निभाया चली गयी पर जुवान पर उफ् तक न आया। क्यों कर गयी मुझे बदनाम तू हिना ? मेरा इस जग में अब क्या काम है हिना ? जानता कि ऐसे कदम उठाएगी बिछड़ कर मुझसे तू मर जाएगी आता न वहाँ से तुझे छोड़ कर मर जाता धरा के उसी कोर पर। यह समाज कैसा दुराचारी है प्रेम-मानवता पर धर्म भारी है आने वाला कल कैसा भावी है प्रियतमा की यादें आज़ भी ताज़ी है। जान, तुम्हारी दुनिया में मैं आऊँगा तुमसे मिलकर पूरा साथ निभाऊँगा। हिना नहीं मरती लाली छोड़ कर जाती है वर्षा की हर बूँद प्यासे की प्यास बुझाती है सूरज की किरणें आशा और पथ दिखलाती है मरे मानव तारें भी दिशा का ज्ञान बतलाती हैं। गलती मेरी ही है हिना प्रेम-रोग लगाकर भागा था जब हिम्मत न थी लड़ने की तब हाथ क्यों तुम्हारा थामा था ? भार्या न होकर भी तू बढ़कर थी कृष्ण की नवलकिशोरी जैसी थी। अंत समय जब आया होगा लोचन मुझे ढूँढ न पाया होगा यह कैसी दुःख की वेला होगी ! मन में निराशा की लम्बी रेखा होगी। अंत काल में आता तो‚ क्या देख सहन कर पाता प्रियतमा को मृत्यु शैय्या पर देख क्या अपने को रोक पाता। अच्छा होता मर जाता साथ तेरे मैं भी दफ़न हो जाता पास तेरे। मैं भी कैसा पापी हूँ किस्मत के हाथों दासी हूँ तड़प-तड़प के रोता था दर्द जुदाई का ढोता था। जिस काया पर कभी मरता था देख-देख आह और चैन भरता था वह मुझसे क्योंकर बिछड़ गयी? मिट्टी से जाकर लिपट गयी। जहाँ तू नहीं कैसे निर्वाह करूँ वहाँ बरसों तेरी हँसी और बातें सुनी लगता अभी परसों। दिन हुआ आम्र वृक्ष‚ वही सूरज, वही लाली पंक्षियों का झूंड‚ वही परती, वही हरियाली सिर्फ तुम नहीं‚ गली, खाट, आँगन, छत सब खाली दुनिया बेजान, विरान‚ दिशाहिन लगता सब जाली। सालों पहले मिलते चुपके से रातों और विरानों मे लगता कल की बातें तू है अभी मेरी बाँहों में तेरी एक-एक बातें और इरादें आते मेरे ख़्यालों में ख़ूब रोता और तड़पता प्रियतमा तुम्हारी यादों में। रात और दिन में मिलते चुपके से घरवालों के मिलकर कितने ख़ुश होते एक-दूजे के बाहों में। जब चाहा मिलता अब ख़्वाबों और ख़्यालों में ना डर घरवालों का ना दुनिया के तानों का तब भय, असुविधा और खोने का डर था मिलन-विरह की वेदना‚ करूणा और मन रूदनमय था। जाति-धर्म की अब प्राचीर नहीं ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं यह सब मानव मन की माया है विनाशी जगत् की अल्प काया है। आत्मा का सम्प्रदाय नहीं टूटे हृदय में कोई भाव नहीं। यादों में कभी जोश तो निराशा भी दे जाता उत्साह तो कभी आशा भी सुख-दुःख के अद्भूत इस संगम से जाने न दूँगा तुझे यादों के जंगम से।


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