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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

बेटी

दीप्ति शर्मा (दुर्गेश)

आसान नहीं यहाँ बेटी बन पाना | खुद की इच्छाये दबाकर दुसरो को खुश रख पाना | जनम से ही भेदभाव के रंग में रंग जाना | आसान नहीं यहाँ बेटी बन पाना | पिता की लाड़ली बनकर सब पे रोब ज़माना | फिर पिता की इज्जत के लिए खुद की भावनाएं छुपाना | खुद के लिए अपनों से पराया धन सुन पाना | आसान नहीं यहाँ बेटी बन पाना | बेटी हो इसलिए जरूरी है हर चीज में शर्माना | मर्दो की बेसर्मी को अपनी आखो में समाना | अपनों के लिए खुद की न्योछवर लुटाना | आसान नहीं यहाँ बेटी बन पाना | शादी के अहम फैसले खुद ना ले पाना | अनचाहे रिश्तो का बोझ उम्र भर उठाना | पिता के खातिर हर जुल्म सह जाना | मायके में ससुराल की झूठी ख़ुशी दिखाना | आसान नहीं यहाँ बेटी बन पाना | समाज के तानो से खुद को बचाना | मर्दो के घूरने पे खुद की ही नजरो को झुखाना | देर से घर आने पे खुद को पाबंदियो की सजा दिलवाना | बिना तुम्हे जाने समाज का तुम्हे गलत ठहरना | आसान नहीं यहाँ बेटी बन पाना | बाहर कोई गलत करे तो सजा दिलवाना | और घर में कुछ गलत हो तो खुद को ही दबाना | घरवालों की वजह से खुद अपनी आत्मा को चोट पहुंचना | क्या वाकई आसान है यहाँ बेटी बन पाना ? अब जरूरी है| खुद को हौसले की मिशाल बनाना | मेरे होने से मर्द है ,मर्द के होने से में नहीं | यह आइना दुनिया को दिखाना | खुद को सर्वश्रेष्ठ बनाकर दुनिया को उसकी औकात दिखाना | अब जरूरी है |खुद के लिए खुद ही आवाज उठाना | तब आसान होगा यहाँ बेटी का बेटी बन पाना | तब आसान होगा यहाँ बेटी का बेटी बन पाना |


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