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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

उस वर्षा की बूँदें

चंद्र मोहन किस्कू

मैंने महसूस किया उस वर्षा की बूँदें जो मेरे गाल पे गिरकर बिखर रहीं थी मेरे कान के पास आकर वह कुछ कहकर जा रहीं थी वह ठंडी बूँदें मेरे अपनों की मीठी गर्माहट महसूस करा रहीं थी . एक पल महसूस किया मैं चाँदी के मोती में नहा रहीं हूँ वह आश्चर्यजनक अनुभव था शायद वे बूँदें ही गुनगुना रहीं थी . शायद वह भी खुश हो रहीं थी मेरी तरह और नाच -गाकर अपनी ख़ुशी मना रहीं थी जब मैं बादल की बरसात की बूंदों को छोड़कर जा रही थी मेरे प्राण ही निकल गये जैसे मैं अनुभव कर रही थी पर फिर भी खुश हो रहीं थी उसे दूर से देखकर वह भी खुश हुई थीं मेरी तरह और ख़ुशी से हँस रहीं थी


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