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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

प्रेम विरह

अनिल कुमार

मैंने पूछा अपने मन से विरहा में छुप, छुप होते रातों के क्रन्दन से क्यों तू याद उसे है करता क्यों अब भी उसकी यादों से अपने मन को मुक्त नहीं है करता क्यों मुक्त नहीं है करता पर पगला यह तो समझ न पाया इसने मुझ को भी तो है भरमाया..... जो कल था बस तेरा अपना आज नहीं वो जीवन सपना फिर क्यों मन मेरा विरहाग्नि में जलकर विरहा तान है गाता........ मैंने पूछा अपने मन से रातों में होती यादों की उलझन से तू क्यों पीर जगाये बैठा है वो तो भूल गया है तुझ को फिर तू क्यों रातों को नींद उड़ाये बैठा है फिर क्यों नींद उड़ाये बैठा है वह प्रेम रहा था तेरा तू ने उसको अपना समझा है वह भूल गया तुझ को तो क्या तू ने भी उसको क्यों नहीं भूला है..... मैंने पूछा अपने मन से प्रेम जो तुझ में जिन्दा है क्या वो उसमें भी जिन्दा होगा क्या उसमें भी जिन्दा होगा पर यह तो मेरा मन क्या जाने यह तो बस वह जाने, कि उसका मन जाने पर फिर भी पगला है रातों को रोया है बिछड़ के उससे जाने कितनी रातों से नहीं सोया है मैं रोया, कि मेरा मन रोया है प्रेम रहा, जो बरसों का कल, परसों का नहीं, बरसों का पल में जाने कैसे भूल गया आज नहीं वो संग है मेरे पर मन मेरा क्यों तोड़ गया मन के बागों में फूल खिलाकर बरखा में प्रेम का सावन भरसाकर क्यों सूखी डाली छोड़ गया...... अब तो मन मेरे मेरा है तुझ से इतना कहना जो छोड़ के तुझको चला गया जिसने तोड़ा है मेरा मन तू भी उसको याद न कर रातों को छुप-छुप के उसके आने की फ़रयाद न कर.... मन मेरे, ओ ! मन मेरे...... उसका प्रेम रहा था झूठा तू क्यों फिर खुद से है रूठा तू अब उसको भूल भी जा विरहाग्नि में तू जलकर ऐसे ना खुद को जला....... मैंने पूछा अपने मन से विरहा की चुभती सिहरन से क्यों तू उसकी याद में रोया है जब वो भूला है तुझको तो अब तू भी उसकी याद भूला अब तू भी उसकी याद भूला........।


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