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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

क्युं नहीं ये जिंदगी...!

आंचल सोनी

क्युं नहीं ये जिंदगी... बदल जाती हर रोज, कभी तो दुःख की काली बदरी हट जाती किसी रोज। क्युं ये तारे आसमान में युं बिखरे बिखरे से दिखते हैं, ऐसा लगता है जैसे ये... एक दूजे से खफा खफा से रहते हैं। क्युं लहराती रहती मुझपर ये दुःख की ममता विहीन आंचल, जो पल पल करती रहती मुझको मेरी ही खुशियों से ओझल। सच्च क्युं नहीं ये जिंदगी बदल जाती हर रोज, कभी तो दुःख की काली बदरी हट जाती किसी रोज।।


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