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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

मेरी दास्तां...!

आंचल सोनी

आज सुनाऊंगी मैं एक कहानी जिसमें एक था राजा एक थी रानी, राजा था अत्यंत अत्याचारी नशा कर रानी को मारना, दहेज और पुत्र के लिए उसे सताना, उसकी क्रूरता भरी यही स्वभाव थी। दया दान व मधुर वचन यही स्वभाव रानी में व्याप्त थी, आकाश की परी जैसी सुंदर थी वो रानी, दुनियादारी के बातों से थी वो बहुत अंजानी, संस्कार भरी थी उसमें खूब सारी। ससुराल को अपने मानती थी मंदिर, सास ससुर को उस मंदिर की मूरत, अपने प्राणों से भी अधिक मानती थी, उस राजा को जिसके लग सूरत थी ना सीरत, मां-बाप के संस्कार ने बना दिया उसे भारतीय नारी की मूरत। ससुराल में नित्य प्रभात उठती थी वो, स्नान कर अपनी मूरत की पूजा करती थी वो, फिर उनके चरणों को धोकर, अपने आंचल से पोंछ डालती थी वो, उस चरण धोए जल को, अपने होठों से लगाकर फिर सिर पर सहलाती थी वो। घर के सारे काज सभांर कर, अपनी मूरत की सेवा करने लग जाती थी वो, किंतु इस लक्ष्मी के महत्त्व को, उसकी सेवा की शोभा को आखिर समझे भी तो कौन वहाँ, सब के मन में झूठ, लालच और फरेब ही सिर्फ समाई थी, उन दानव रूपी मूरत को प्रसन्न करने का, कोई मार्ग ऐसा ना रहे जिस पर रानी ने अपने कदम ना बढ़ाए हों। रानी से उसके.... पति को-जरूरत की पूर्ति , सास को- दहेज की पूर्ती , तो ससुर को पोती की पूर्ति चाहिए थी, पूर्ती के अभाव में रानी पर वार पे वार होते रहे, अत्याचार पर अत्याचार होते रहे। गर्भ में जब उनके एक कन्या हुई तो, सास ससुर ने उसका शरीरांत कर दिया, रानी खूब चीखी-चिल्लाई, पर उनकी वहाँ किसी ने ना सुना। फिर इन सभी से तंग आकर उसने, अपने मां बाप को याद किया, और चली गई उस असल मंदिर में जहां उसका पूरा सम्मान था, उस असल मंदिर में हुए तीन मूरत, कुछ वर्षों तक ननिहाल रहे यह, प्यार मिले ने खूब भर भर कर। लेकिन देखो क्रोध में लिप्त इन दैत्य जनों को, देखने आए इन मासूम मूरत की सूरतों को। फिर इन्होंने झगड़ा सुलझा कर, अपनी पुत्री को विदा किया... लेकिन इन्हें भी मालूम कहाँ था, कि उस रानी के भविष्य का भयानक दर्पण अभी बाकी ही था। राजा के अवैध संबंध थे, जिस पर कोई पाबंदी नहीं थी, पता चली यह बात उसे जब टूट गई पूरी तरह वो तब, जब डाली उसने तीन मासूमों पर एक नजर, जिनका भविष्य उज्जवल बनाना था उसका लक्ष्य तो चुप हो गई, और निभाने लगी पतिव्रता तब। रानी ने यह सोच लिया कि मैं जीत लूंगी अपनी सच्चाई से उनकी बुराई को, लेकिन ऐसा कुछ हुआ ही कहां...। कभी सास जलाकर मारने की कोशिश करती, कभी पति मार-मार अधमरा कर देता, तो कभी ससुर अपने तानों से... रानी का हाल बेहाल कर देता लेकिन शायद उसके कुछ कर्मों से, खुदा भी उस पर मेहरबान थे, तभी तो बचा लिया उसे हर दफा मौत के कगार से। आखिर वह दिन आ गया जब रानी की सहनशक्ति का बेड़ा टूट गया, एक अद्भुत घटना घट गई बुराई उस वक्त जीत गई, सच्चाई उस दफा हार गई, उस रानी ने जहर पीकर मौत के कगार को चूम लिया। लेकिन उन वाहियादों ने तो, सुकून से उसे जलने भी ना दिया जल्दी-जल्दी में भागे वो, जंगल के कूड़े कचरे को एकत्र किया, उन कुंडों में रानी को डालकर उसे कैरोसिन से जला दिया। आधा तन तो जल गया मगर आधा यूँ ही बच गया तो... जंगल में पड़े टायर चप्पल चमड़े आदि, को एकत्र कर पुनः उसे जला दिया। पिता को अपने अय्याशी से फुर्सत ना थी, दादा दादी की अलग ही दुनिया थी, पिता के जीते जी तीनों बच्चे पूरी तरह अनाथ हो गए, फिर खुदा ने एक फरिश्ता भेजा, लेकिन वह ना सिर्फ फरिश्ता बल्कि वह तो स्वयं खुदा ही थे जो, इस रिश्ते में बंधे नाना नानी मासी मामा के रूप में, हमारी आंखों के सामने उतर आए। क्योंकि फ़रिश्ते तो हमारी जिंदगी में आते हैं, पल दो पल के लिए और हमें, संकट से बचाकर चले जाते हैं हमेशा के लिए। लेकिन इन फरिश्ते रूपी खुदा ने तो, उम्र भर के लिए हमें अपनी, दुनिया का हिस्सा बना लिया इन फरिश्तों ने हमें वह सारी खुशी दी, जो हमारे हाथों की लकीरों में, मां की चिता जलते समय ही मिट चुकी थी। आज सलाम है उस खुदा को और हमारी जान कुर्बान है उन फरिश्तों को, जो हमें उस वक्त अपनी जिंदगी का, हिस्सा बना लिया जब हमारे, खुद के पिता ने अपनी जिंदगी का, हिस्सा बनाने से इंकार कर दिया। आज शर्म आती है, यह कहने में, कि राजा हमारा पिता था। और गर्भ होता है, यह कहने में कि वह रानी हमारी मां थी। आज फरिश्तों ने उनके लक्ष्य को बना लिया अपना लक्ष्य और, देखना चाहते हैं हमें जिंदगी के... उस मुकाम पर जहां एक अच्छी मंजिल हमें नहीं, एक अच्छी मंजिल खुद हम चुनें।।


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