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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

अनाथ

धर्मेन्द्र कुमार

कभी—कभी आँखों के सामने ऐसे दृश्य आ जाते हैं; जिन्हें देखकर रोंगटें खड़े हो जाते हैं, आँखें भर आती हैं, और हृदय भाव—वृहल होकर शोक—संताप में डूब जाता है। हम सोचने पर विवश हो जाते हैं। हाय रे किस्मत ! इस नन्हीं—सी बच्ची के हाथों में प्लास्टिक, काग़ज़, लोहा आदि चुनने की बोरियाँ थमा दी। अभी इसकी उम्र ही क्या है ? मुश्किल से दस साल की होगी। यह उम्र खेलने और पढ़ने की होती है। दूसरे बच्चों को खेलते, स्कूल जाते, मिठाइयाँ खाते देखकर क्या इसका मन न डोलता होगा ? इसके माता—पिता कैसे हैं, हैं भी या नहीं ? होते तो क्या इनकी यह दशा होती ! ख़ुद मेहनत—मज़दूरी करते, आधे पेट खाते, किन्तु इसे पढ़ाते, इसे वे सारा सुख देते जो बालपन में मिलता है। तन पर साबित कपड़े नहीं, जो है वह इतने मैले की दुर्गंध आ रही है। बाल मानों किसी पंक्षी का घोंसला है। शरीर इतना गंदा की रईस लोग इससे दूर भागते हैं, मानों छु जाने से ही अपवित्र और गंदे हो जाएँगे।

मेरे सामने एक बड़ी—सी बोरी लिए रेलवे प्लेटफार्म पर और कभी लाइनों में जाकर प्लास्टिक की जुठी बोतलें, प्लेटें, ग्लास आदि चुन रही थी। उसे देखकर मेरी आँखें भर आयीं, मन में तरह—तरह के विचार आ रहा था। मेरे सामने ही प्लेटफार्म पर दूसरी तरफ़ उसी की उम्र के बच्चें अपने माता—पिता के साथ बड़ी ख़ुशी से उछल—उछल कर खेल रहे थें। वे कभी रूठते, कभी मानते, कभी नखरें दिखाते। उनके माता—पिता, उनके सारे नखरें उठाते। उनकी खाने की, खिलौने की, घूमने की, इच्छाएँ पूरी करते अथवा पूरा करने का वादा करते। मगर इस बेसहारा लड़की का कौन है जो इसे खाने को पूछे ? खायी है या भूखी है, इस बात से किसी को क्या मतलब ! मेरी भी एक बच्ची है, बिल्कुल इसी की उम्र की, नटखट, हँसमुख, जिसे देख लेने से मेरी सारी थकावट मिट जाती है। मगर है बहुत पाजी, कोई काम सीधी तरह से नहीं करती। सुबह में स्कूल जाना है, दसों दफ़े जगाना पड़ता है, हजारों दफ़े मिन्नत और मनाना पड़ता है, तरह—तरह के लालच और झांसा देना पड़ता है। अब खिलाने के लिए मत पूछिएगा कि क्या—क्या नहीं करना पड़ता। देवीजी ग़ुस्से में कभी दो—चार हाथ खिंच भी देती है। किन्तु मेरे सामने नहीं; क्योंकि मेरे कोप का भागी नहीं बनना चाहती। ग़ुस्से में मार तो देती है, किन्तु बाद में बहुत पछताती है। उसकी क्षति—पूर्ति सूद समेत करती है, घण्टों सीने से लगाए ख़ूब प्यार और दुलार करती है, मिठाइयाँ देती है,कई झूठे—साचे वादे भी किये जाते हैं। मगर यह बेसहारा, अनाथ लड़की.......................।

जब वह लड़की लाइनों में पड़ी सारी प्लास्टिक चुन ली, तो प्लेटफार्म पर आकर ऊपरी पैदलगामी सीढ़ी के नीचे अपनी बोरी रखकर उसके ऊपर लेट गयी और ललचाई आँखों तथा क्षुधातुर मुख से अपने हमउम्र के बच्चों को देखने लगी; जो नये—नये कपड़े पहने कहीं जाने की ख़ुशी में हर्षोल्लासित थें तथा मिठाइयाँ खा रहे थें। मैंने सोचा, उस बेचारी के हृदय पर क्या बीत रही होगी, मन में क्या भाव आ रहे होंगे ? वह यह सब क्यों करती है, ज़रूर कोई मजबूरी होगी। कई बार जी चाहा, जाकर पूछु या कुछ पैसे ही क्यों न दे दूँ ? बेचारी भूखी मालूम होती है ! क्यों नहीं किसी अनाथालय में चली जाती ? आजकल तो स्कूलों में भी खाने को मिलता है; वहाँ क्यों नहीं जाती, पढ़ायी के साथ खाना भी मिल जाता। इस तरह की और कितनी—ही स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा अथवा सरकारी योजनायें शुरू है। उनका लाभ ये लोग क्यों नहीं लेते ? इन अनाथ, बेघर, बेसहारा बच्चों के लिए सरकार कोई क़दम क्यों नहीं उठाती, इन्हें मुख्य धारा से जोड़ने में अपनी भूमिका क्यों नहीं निभाती ? मेरे पास ही कौन ऐसी संपत्ति है, कमाता खाता आदमी हूँ। किसी घटना अथवा दुर्घटना का मैं शिकार हो जाऊँ या मर जाऊँ, तो मेरे बच्चें, मेरी पत्नी, उनका भी यही हाल होगा ? क्या वे भी इसी तरह............? हे भगवान ! यह मैं क्या सोचने लग गया ? जिस पत्नी को कभी घर से बाहर न निकलने देता हूँ, जिस बेटी का ज़रा—सा दर्द बर्दास्त नहीं कर सकता। जब कभी वह बीमार होती है और डॅाक्टर उसे सुई लगाते हैं, तो मैं देख नहीं पाता, आँखें बंद कर लेता हूँ या बाहर चला जाता हूँ। वह यह सब कैसे सह पाएगी ? यह भी तो बेटी है, किसी पिता की लाड़ली, किसी माँ की दुलारी; पर न पैरों में चप्पल, न तन पर सुध कपड़ें, इस कड़ाके के ठंड को ये नन्हें मासूम बच्चें कैसे सह रहे हैं ? न पेट में अन्न, न सर पर छत। आज पहली बार मुझे रोटी खाने, आलिशान मकान में रहने और मखमली गद्दों पर सोने पर ग्लानि हुई। अपने आप को कितना नीच और तुच्छ महसूस कर रहा हूँ। इस समाज में जहाँ ऐसे बच्चें अथवा लोग हैं जो भूखे सोते हैं; जिनके पास पहनने को वस्त्र नहीं, रहने को घर नहीं, वैसे समाज में हमें भरपेट खाकर निश्चिन्त सोने और घूमने तथा ऐयासियॅा करने का कोई हक़ नहीं। यह समाज अथवा समाज के लोगों, मानवता, इंसानियत तथा ईश्वर, मसीह, ख़ुदा इन सबके साथ धोखा है, विश्वासघात है। इस समाज में हम कितने अकेले, लचार और बेबस हैं; फिर भी कितने अभिमान, घमण्ड और दर्प में चूर हैं। यह हमारे अहम की पराकाष्टा है, जहाँ हम किसी के व्यथा, दर्द, पीड़ा को समझ नहीं पाते। बल्कि दिल्लगी और हँसी में उड़ाते हैं। यह हृदयहीनता नहीं तो और क्या है? ऐसे समाज का निर्माण क्यों नहीं होता, जहाँ हम अपने बाद अपने परिवार या परिजनों को सुरक्षित महसूस करतें। तब हमारी मृत्यु कितनी आसान हो जाती। हम मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेते। यह मानवता की विजय होती, पूरे मानव—जाति की जीत होती।

कई बार सोचा, उस बच्ची को बुलाकर सारा हाल पूछु। अकेले होती तो अबतक पूछ लिया होता। इतने लोगों के सामने लज्जा मेरे मार्ग में बाधक बन जाती है। मैं बहुत शर्मिला इंसान हूँ। कई बार यह लज्जा मेरे बड़े—बड़े कार्यों में बाधा बन जाती है। तब मुझे अपने आप पर बहुत क्रोध और ग्लानि होती, तुच्छता और दब्बुपन का अनुभव होता। किन्तु मैं इस चक्रब्युह को भेद नहीं पाता। कई बार पॉकेट से सिक्का निकाल कर भीड़ होने के कारण लज्जावश भिखारी के कटोरे में डाल नहीं पाता। हाँ, अकेला देखकर ज़रूर डाल देता। सहसा मुँछें वाले महाशय के दोने से छिटककर एक समोसा गिर पड़ा। उस महाशय ने चारों तरफ़ देखकर उस समोसे को पैरों से धक्का देकर सीढ़ी के नीचे कर दिया। वह लड़की दौड़कर उठा ली, और खाने लगी, शायद यही उसकी आकाशवृति थी। वहाँ खड़े बच्चें यह दृश्य देखकर उसे चिढ़ाने लगे। वह ऐसे मस्त होकर खा रही थी; मानों उनकी आवाज़ इसके कानों तक आ ही नहीं रही हो। यह दारूण—दृश्य देखकर मेरा हृदय कांप उठा। मैं मन ही मन ईश्वर को कोसने लगा। यह तेरा कैसा संसार है ! हम सब तेरे ही संतान है, तो यह भेद क्यों ? यह अन्याय, अपमान और दुःख क्यों ? विषम परिस्थितियों में न जाने कहाँ से अदम्य साहस और उत्साह भर जाता है; तब हमारे अंदर छिपी लज्जाशीलता, संकोच और निर्लज्ता सब हमारी दासी बन जाती हैं। मैं उठ खड़ा हुआ, जाकर उस लड़की का हाथ पकड़ लिया और समोसा छिनकर फेंक दिया।

पूछने पर पता चला कि उसकी माँ को मरे दो साल हो गया। माता के मरते ही पिता की नज़रें फिर गयी। यह पुरूष के छिछोरापन का पहला ज्वलंत उदाहरण नहीं है; बल्कि कई महाशय इससे भी ऊँची कीर्ति स्थापित किये हैं। उसके पिता दूसरी शादी कर लिये है। विमाता को इसके सुरत से नफ़रत है। इसलिए, इसे घर से निकाल फेंकी है, मानों कोई वस्तु हो। यही बेटी जो कभी दूलारी और जान से प्यारी थी, वही अब एक आँख नहीं भाती। जिसे एक दिन भी देखे बिन कल न पडता था अब महिनों तक ख़बर न लेते‚ गोया वह है ही नहीं। वाह रे मानववृती‚ तेरे वादे ओर इरादे ! तेरी स्वार्थ और वासनावृति का जवाब नहीं !

घर भी कहाँ है, जहाँ शहर के कचड़े फेंके जाते हैं, पीछे से बदबुदार नाला बहता है‚ वहीं दो—चार लकड़ियों पर बोरा डालकर उसी में रहते हैं। शहर के लोग नाक बंद कर, तेज़ कदमों से निकल जाया करते हैं, पर वहीं इनका बसेरा है। उस लड़की ने अपना नाम मीना बताया। मीना को घर गये महीनों हो जाते। घर जाने पर बिमाता इसके सारे पैसे ले लेती और मारकर भगा देती। वह घर क्यों जाए और किसलिए जाए ? आदमी घर या गाँव आता है; क्योंकि अपनों का प्यार और स्नेह बाँध लाता है। वहाँ उसे प्रेम, स्नेह, इज्जत और मान—सम्मान मिलता है, अपनापन अथवा अपना कुछ होने, कुछ रहने का अभिमान रहता है। बच्चें हो या बड़े जहाँ उन्हें भरपेट भोजन और इज्जत मिलेगा, वह उधर ही जाएँगे। ये लोग दूसरे—तीसरे शहर निकल जाते और महीनों बीता के आते। इनके लिए जहाँ भोजन और रहने की व्यवस्था है, वहीं अपना शहर है, वहीं अपना घर है।

वह बोतलें और अन्य चुनी हुई वस्तुएँ ले जाकर कबाड़ी वाले को दे देती, वह जो कुछ देता, उसी में खा—पीकर स्टेशन या फ़ुटपाथ पर सो जाती। आश्चर्य तब हुआ जब कबाड़ी वाले के पास गया तो ऐसे किस्मत के मारे दर्जनों लड़कों और लड़कियों को देखा। सभी नाबालिग थें। किसी की उम्र बारह से अधिक न थी। सबने अपना दुःखड़ा सुनाया। कोई अनाथ था, किसी की माँ मर गयी थी, और शराबी पिता शराब के लिए बच्चों से भीख मंगवाते, प्लास्टिक चुनवाते और शाम को जो कुछ मिलता, छिनकर दारू की भेंट चढ़ा देते। कई घर की हालत से मजबूर थें। बीमार माँ अथवा पिता के इलाज और भोजन के लिए यह सब करते थें। इस तरह एक—एक कर सभी की दारूण—व्यथित कथाएँ सुनी। मेरे अंदर आँसुओं से सृष्टि को जलमग्न करने की क्षमता होती, तो कब का प्रलय कर दिया होता। इन नन्हें, कोमल बालकों के साथ इतना बड़ा अत्याचार, यह सरासर अन्याय, पाप, अधर्म और नीचता है। मैं विचलित हो गया, इनके उद्धार और कल्याण के लिए, इनकी दिशा—दशा सुधारने के लिए।

कहने और करने में ज़मीन आसमान का अंतर है। इस निष्कर्ष पर तब पहुँचा, जब महीना दिन दौड़ते हो गया; किन्तु कोई ऐसी संस्था अथवा आश्रम न मिला, जो उन्हें शरण दें या मान—सम्मान, भरपेट भोजन और शिक्षा दे सके। इन अनाथों‚ दीन—गरीबों में कई अभिमानी, विलक्षण प्रतिभा के थें, जो मेहनत की कमाई खाना चाहते थें। जो अपंग, अपाहिज और लाचार थें, वे मजबूर थें, फिर भी कुछ करने को उतावले थें। उनका साहस, और उत्साह देखते बनता था। पर सरकार की ऐसी कोई योजना, कोई नीति नहीं बनी, जो इन बेसहारों को आश्रय दे सके। ये अनाथ अपना या अपने बीमार, लाचार परिवार का पेट पालने हेतु काम न करे, तो क्या करें ? सरकार की नीतियाँ इसमें भी बाधक बन जाती हैं। यदि बालक को अनाथालय में डाल दे, तो उनके बीमार, अपाहिज, अंधे, लाचार, माँ—बाप की सेवा कौन करेगा ? जहाँ देश में इतने गौशाला खुल रहा है, मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे बन रहे हैं। वहीं ऐसे अनाथों के पालन हेतु आश्रम या इनके योग्य रोज़गार की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती ? और यदि ऐसे आश्रम है, तो ये बच्चे बेघर, बेसहारा, भूखे सड़को पर मारे—मारे क्यों फिर रहे हैं ? यह कैसा प्रजातंत्र है, जहाँ हिमालय के ऊँचाई और समुन्द्र की गहराई के बराबर विषमता पायी जाती है ! जहाँ कुत्तें मेवे और बिस्कुट खाते हैं, गाड़ियों में घूमते हैं और इंसान रोटियों को मोहताज़ हैं !

इन बालकों के लिए बहुत दौड़—धूप किया। इस क्रम में मैंने और भी कई नये अनुभव किया। बहुत—सी ऐसी बुढ़ी माताएँ और काकाओं से मिला, जिनको उनके बहुएँ और बेटों ने घर से निकाल दिया था या फिर नौकरों और जानवरों से भी बद्तर व्यवहार करते हैं। अनाथ केवल वही नहीं हैं जिनके माता—पिता कोई धटना अथवा दुर्धटना का शिकार हो गये या कोई अपना सगा—संबंधी नहीं हैं या होते हुए सगों ने अपनाने से इंकार कर दिया; बल्कि इस संसार में चार—चार और छः—छः बेटें—पोतों और बहुएँ वाले माता—पिता अथवा दादा—दादी भी अनाथ हैं। जिस घर और घर के प्राणियों की उन्होंने सृष्टि की, उसी घर में बेगाने बनकर जी रहे हैं, रोटियों को तरस रहे हैं। यह परिस्थिति तब और जटिल हो जाती है जब अपने ही बेटे—पोतों या परिजनों द्वारा उन्हें उस घर से निकाल दिया जाता है। या फिर उनकी बात न तो सूनी जाती है और न ही पूछी जाती है। यह स्थिति भी कुछ निकाल बाहर करने जैसा ही है। उनकी दारूण कथा और भी रूलाने और तड़पाने वाली है। उसे सुनाकर आपको और दुःखी या चिंतित नहीं करूँगा। कुछ लालची मनुष्यों द्वारा इन भोले, मासूम बच्चों से चोरी, छिना—झपटी तथा गैर—कानूनी काम कराये जा रहे हैं। सबका एक मात्र कारण—बढ़ती आबादी, बेरोज़गारी, और निर्धनता है। सरकार दो से अधिक बच्चों के जन्म पर पाबंदी लगा दे, या जनसंख्या नियंत्रण के लिए कोई उपाय ला दे। जिन्हें दो से अधिक बच्चें चाहिए, वे ऐसे बच्चों को गोद ले, जो बेसहारा और अनाथ है। भूखमरी मिटाने और संपन्नता लाने का यही एक उपाए है। यदि आबादी पर नियंत्रण न किया गया, तो इससे भी बुरे दिन आने वाला है। जनसंख्या निषेध एक साथ कई समस्याओं का समाधान है। पर सरकार और राजनीतिक पार्टियों को इससे क्या ? उन्हें अपने वोट और ओहदे पर आँच न आनी चाहिए। उन्हें किसी अनाथ से क्या मतलब, कोई रोटियों को तरसता है, तरसे, भूखों मरता है, मरे। देश और जनता से उन्हें क्या काम। ये उनका साधन है, साध्य नहीं। साधन का उपयोग कर छोड़ देना ही हमारा काम है। साध्य तक पहुँचना हमारा उद्देश्य होता है।

मैं उनमें से एक—दो लड़कों को अपने साथ रख भी लेता; किन्तु घर के लोगों की मानसिकता, दकियानुसी विचार, आर्थिक स्थिति तथा इसी प्रकार की और भी कई बाधायें मेरे मार्ग में रोड़ा बन जाती है। हालाँकि इन सब तर्कों से मैं अपने—आप को संतुष्ट और निर्दोष साबित नहीं कर सकता। शायद यह मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है।

इसलिए तो ये बेबस, अनाथ, और लाचार हैं। सोचते सब हैं, भावुक सब होते हैं, अफ़सोस और दुःख भी सभी व्यक्त करते हैं, मगर उनके कल्याण हेतु आगे कोई नहीं आता। मेरी तरह हजारों लोग रोज़ ऐसे अनाथ, असहाय, अपंग, बेसहारा, दुखियारा को देख कर, समाज और सरकार को कोसते हुए अपने रास्ते निकल जाते हैं। अपने ऊपर परिवार का, आस—पड़ोस का, इतना तनाव और परेशानी है कि कौन दूसरे झंझट में उलझे। पर हमारे दो बच्चे और होते, तो क्या हम उनका पालन नहीं करते, करते और पूरी लगन से करते। जो दस—बारह बच्चे पैदा करते हैं और उनका पालन करते हैं। क्या वे दो—चार अनाथ बच्चों का पालन—पोषण नहीं कर सकते। यदि नहीं कर सकते, तो अपने भी चार या आठ या दस बच्चा पैदा करने का कोई अधिकार नहीं। आख़िर इन अनाथों का क्या होगा ? क्या वे इसी तरह पैसों के लिए किसी लालची मनुष्य द्वारा बेच दिये जाएँगे, उनके गुर्दें निकाल लिए जाएँगे ? वे भूखा—भाव में रोटियों को तरसते, भात—भात करते हुए मर जाएँगे या इससे पहले समाज और सरकार कोई क़दम उठाएगी ?


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