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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

प्यासी कविता
(जल दिवस पर विशेष)

सुशील शर्मा

खंडहरों में तब्दील होते गांव सूखती नदियां मरते शहर। प्यास की कविता पानी का उपसंहार। बोतलों में कैद बूंदें बिकती सरे बाजार । न पानी बचा न पानीदार न बचा ताल न पोखर न नहर। अनगिनित कुल्हाड़ियाँ काट रहीं हैं जंगल। पानी के लिए हर पनघट बन गया है दंगल। नदियां हैं अबला सी लुटती हैं हर पहर। जीवन है जीना तो पानी बचाओ रे। अपने ही कर्मों से मौत न बुलाओ रे। चेत जाओ चेत जाओ न पियो जहर।


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