मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

रेंग रहा नस-नस में अवसाद

राजपाल सिंह गुलिया

रेंग रहा है साँप सरीखा , नस नस में अवसाद सखे . हुई खोखली संबंधों की , प्रेम भरी बुनियाद सखे . वादे करके किसने तोड़े , अंबर के चाँद - सितारे . देख भँवर की करतूतों को , अब डूबन लगे किनारे . चुभा रहा है शक भी सुइयाँ , करके वाद - विवाद सखे . मन आँगन में चढ़ी कढ़ाई , फिर भी हैं लड्डू फीके , शातिर बिल्ली के भागों से, नहीं टूटते अब छीके . खड़ी याचना हाथ पसारे , भूल गई सब याद सखे . दौलत अपनी चमक दिखा कर , प्रेम डगर को रोक रही . लाज देख लो निर्ल्लज होकर , फैंक आज निज मोक रही . खरे लोग अब मिलते ऐसे , हों जैसे अपवाद सखे .


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें