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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 60, मई(प्रथम), 2019

देश के बंटाधार

डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी

अधाधुंध दरबार, पंजीरी गदहा काटैं । देश के बंटाधार, पंजीरी गदहा काटैं। घोड़े बंधे पड़े बंधन में,गदहा भरैं कुलाँच । मोर गये अज्ञातवास में, गिद्ध रहें हैं नाच। शेरों पर अब हुकुम चलावैं,लोमड़,श्वान,सियार , पंजीरी गदहा काटैं। देश के बंटाधार,............................ हंस खा रहे दाना तिनका ,कौव्वा मारै मोती । अब जंगल की राजनीति, पट्टे के बल पर होती। पट्टे के आगे, दिमाग ,साहस, सब कुछ बेकार , पंजीरी गदहा काटैं। देश के बंटाधार ................................ झूठे किस्से गढ़े गये, और जम के हुआ प्रचार। इश्तिहार निकले जंगल में, मृग ने किया शिकार। रुदन लकड़बग्घे करते, हम सहते अत्याचार, पंजीरी गदहा काटैं। देश के बंटाधार............................


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